Saturday, 3 November 2018

उत्तर-आधुनिकता विमर्श और पहचान का संकट





3/11/2018 ,8:48 PM., वर्धा, महाराष्ट्र


उत्तर-आधुनिकता विमर्श और पहचान का संकट


उत्तर-आधुनिकता पर विचार करने से पहले आधुनिकता की संकल्पना व उत्तर-आधुनिकता के अन्तःसम्बन्धों को समझना जरूरी हैं। तथा पश्चिम में ये विचारधारा किस रूप में विकसित हुई व भारत के संदर्भ में ये कितनी कारगर सिद्ध हो सकती है ? इसके अलावा इस अवधारणा के परिप्रेक्ष्य में विचारधाराओं का अन्त किस तरह से विमर्शों की शुरूआत करता है? हाशियाकृत समूह व तत्व किस पहचान के संकट से गुजर रहे है ? क्या हाशिये के समूह, केन्द्र में अपना अस्तित्व बनाए रखने की लड़ाई लड़ रहे है ? या फिर समग्रता के साथ रहते हुए अपनी एक अलग पहचान भर बना लेना चाहते हैं ? आदि कई सवालों को जानना होगा। इन्हीं कुछ बिन्दुओं को लेकर इस लेख में चर्चा की जा रही हैं। वैसे ये विषय काफी गंभीर और विस्तृत हैं, लेकिन यहाँ इसके संबंध में पहचान के कुछ मुद्दों को उठाया जा रहा हैं। उत्तर-आधुनिकतावाद केंद्रीय वर्चस्ववाद को अँगूठा दिखाकर स्थानीयता तथा उसकी भिन्नताओं पर बल देता है। जबकि आधुनिकता केंद्रीयता, एकरूपता और सार्वभौमिकता का जाप करती रही है। आधुनिकता में पुनर्सजन की पुकार थी जबकि उत्तर-आधुनिकता में विकेंद्रीकरण, अलग पहचान, अलग आवाज और विखंडन (वि-रचना) का बोलबाला प्रमुखता से हैं। जान रंडेल उनकी इसी सीमा को इंगित करते हुए कहते हैं कि "उत्तर-आधुनिकता में समाज एक ओर विखंडित और श्रेणीयुक्त बन जाता है, तो दूसरी ओर सूचना निर्भर प्रबंधन में नियुक्त हो जाता है और इस जगत में हर विखंडित समूह अपने आसपास फिर केन्द्र को बनाता जाता है। "(उत्तर आधुनिकतावाद-जगदीशवर चतुर्वेदी, पृ-58) अतः उत्तर-आधुनिक दृष्टिकोण से इस पहचान के संकट को किस तरह देखा जाना चाहिए, इस पर विचार की आवश्यकता हैं। आगे हम इस उत्तर-आधुनिकतावाद को मोटे तौर पर तीन स्तरों पर देख सकते हैं- स्थानीय., राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय और फिर इन्हीं आधार पर कई तरह के अर्थ निकाले जा सकते हैं। 

उत्तर-आधुनिकतावाद अब बहु-संस्कृतिवाद या बहुलतावाद पर आधारित नया विमर्श है। उत्तर-आधुनिकता बहुकेंद्रीयता की संकल्पना को लेकर चलती है और यह बहुकेंद्रीयता व्यक्ति की अपेक्षा समूहों की केंद्रीयता है। भारत में विविधतापूर्ण समाज विद्यमान है जहाँ पर किसी एक विमर्श को संबोधित करना संभव ही नहीं है। इन सबके बावजूद भी हमारा समाज अभी भी स्त्री, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की अभिव्यक्तियों और उनकी सामूहिक अस्मिता के प्रति अत्यंत अनुदार और असहिष्णु है जबकि उत्तर-आधुनिक समाज में इन समूहों की आवाज को सहज भाव से स्वीकार किया जाना अपेक्षित है। इसीलिए उत्तर-आधुनिकात पर सोचने की जरूरत है। 

असल में उत्तर-आधुनिकतावाद एक ऐसा ग्लोबल खेल है, जिसमें हम सब शरीक हैं। वह हमारी ही भूमंडलीय अवस्था की रामायण है। इस नवीन भूमंडलीय रामायण में हम सबका बोध बदल रहा है और हमारे सभी सांस्कृतिक-ज्ञानात्मक प्रतीक बाजारवाद में बिकने को खड़े हैं। इस दृष्टि से 'शाक्ति तथा ज्ञान की अवस्था के बदल जाने का यह नया अर्थशास्त्र, नया समाजशास्त्र हैं। (उत्तर-आधुनिकतावाद और दलित साहित्य-कृष्णदत्त पालीवाल, पृ-5) रोलां बार्थ, देरीदा, मिशेल फूको, पाल डी मान आदि ने संस्कृति बोध के सभी पुराने पैमानों को या पैराडाइम्स को बदल दिया है। जहाँ एक ओर पश्चिमी देश उत्तर-आधुनिक होते जा रहे है वहीं भारत ने अभी भी आधुनिकता को गले लगा रखा है।

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उत्तर-आधुनिकता के सात झटकें- 

सुधीश पचौरी ने उत्तर-आधुनिकता विमर्श को बड़े ही सहज ढंग से सात झटकों के रूप में इस तरह निरूपित किया हैं-
·         प्रभु ! सात झटके लगे हैं पचास बरस में, सात झटकों को सात सौ बराबर समझें। 
·         पहला झटका यह कि बचत गई है, बाजार आया है। संयम गया है। इच्छाओं कामनाओं का साम्राज्य खुला है, दुख-गायन की जगह सुख-संचय का भाव आया है, सुख दिखाने, इतराने का भाव आया है। पूँजी बढ़ी है। 
·         दूसरा झटका यह है कि एक ही साथ स्थानीयता और भूमंडलीकरण जगे हैं। शीत-युद्ध गया है। गर्म शांति आई है। देशकाल गड़बड़ाया है। मृदु मंथर गति तेज हुई है।रीयलिटी से हाइपर-रीयल में लुढ़क आए हैं। 
·         तीसरा झटका है मीडिया मार्केट की मित्रता। हर अनुभव सूचना बन रहा है और अर्थ की स्थिरता नहीं बच रही, महानता का वृत्तांत नहीं बन रहा, महान लेखक नहीं हो रहे। 
·         चौथा झटका दलितों ने दिया है। वर्ग जाति में बदल गया है। माक्र्सवाद मंडलवाद का पर्याय है और प्रसन्न है। इस क्रम में हाहाकार इसलिए बढ़ा है, क्योंकि हमारे जैसे बामनों के हाथ से साहित्य-संस्कृति का धंधा निकल गया है और जिन्हें अब तक संस्कृति के पावन मंदिर में हम बामन लोग घुसने नहीं देते थे, वे खुद अपने राग-रागिनियाँ बनाने लगे हैं। वे हमें साहित्य में मानते ही नहीं। हाय ! 
·         पांचवाँ झटका, भगवन ! औरतों ने दिया है कि वे जिधर देखों-लिंग-लिंग चिल्लाती डोलती हैं। साहित्य से हमने लिंग गायब कर दिया था, वे फिर उसे ले आई हैं, साहित्य के पवित्र मंदिर में लिंगवादी पाठ को देरिदा, फूको, लाकां जैसे धूर्त एलाउ कर रहे हैं। 
·         छठा झटका उपभोक्ता संस्कृति के कारण है, क्योंकि तमाम गरीब-जन दलित सब खाने-पीने की इच्छा करने लगे हैं, जो पहले हम लोगों को ही नसीब था। वे हमारे जैसे बनने लगे हैं : उपभोक्तावाद ने हमारी सत्ता के खिलाफ हिंसा बढ़ा दी है। चारों ओर उपभोग है, हमारे वक्त में कोई ऐसे पेटू हो सकता था कि पेट को विचार से बड़ा समझे ? सच यह है, हमारा वक्त जा रहा है। उनका वक्त आ रहा है। 
·         सातवाँ झटका यह है कि इन झटकों को इसलिए नहीं जान पा रहे, क्योंकि झटका सहज हैं। और ऐतिहासिक हैं, षडयंत्र नहीं है। वह स्वायत्त क्षेत्र नहीं बन रहा है जहाँ हम काजर की कोठरी की कलंकमयता से मुक्त, अपनी सफेदी बरकरार रख सकें और विद्रोह-प्रतिरोध के लिए जगह निकाल सकें। पिछला पूँजीवाद फुलाता था, सुलाता था, यह झटके देता है, कष्ट देता है, लेकिन ऐसी मीठी संड़ाध है कि सब अच्छा लगता है। झटका लगता ही नहीं, फील नहीं होता। और इन दिनों तो सब फैशन में उत्तर-आधुनिक हुए जाते हैं। (उत्तर-यथार्थवाद-सुधीश पचौरी, पृ-182-83) 

लियोतार्द ने उत्तर-आधुनिकता की मुख्य पहचान 'विकेन्द्रीकरण' के रूप में की है, जिसके चलते आधुनिकता के सभी महावृत्तों का अवसान हो जाएगा। न ईश्वर होगा, न धर्म, न मनुष्य होगा न विचारधारा, न इतिहास रहेगा और न ही तर्क की केन्द्रीय स्थिति। साहित्य, साहित्यकार और आलोचक भी क्रमशः समाप्त होंगे तथा 'पाठक' और उसके 'पाठ' का उदय होगा। लोकप्रिय साहित्य अकादमिक साहित्य पर हावी हो जाएगा। जेमेसन ने उत्तर-आधुनिक स्थितियों को 'वृद्ध पूँजीवाद' का सांस्कृतिक तर्क कहा है। इसमें आधुनिकता द्वारा छोड़े गए रिक्त स्थान नई तरह की सांस्कृतिक चीजों से भर जाएँगे तथा 'निजी जगत' (प्राइवेसी) का अन्त हो जाएगा। (अंतिम दो दशकों का हिन्दी साहित्य)

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आल्विन टाफ्लर 'फ्यूचर-शॉक' पुस्तक लिखने के बाद 'दि थर्ड वेब' पुस्तक लिखते हैं और 'पॉवर शिफ्ट' शीर्षक अपनी पुस्तक में उत्तर-आधुनिकतावाद को समग्रता में प्रस्तुत कर देते हैं। यह तीनों पुस्तकें अलग-अलग दिखाई देने पर भी आपस में जुड़ी हुई है तथा तीनों मिलकर उत्तर-आधुनिकतावाद के तमाम पहलुओं का बौद्धिक बिंब समग्रता में निर्मित करती हैं। इन तीनों का विषय एक ही है-नवीन परिवर्तन। ध्यान में रखने की बात है कि उत्तर-आधुनिकतावाद की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है-बहुलतावाद या नव्य संस्कृतिवाद। यह विशेषता आभिजात्यवादी वर्चस्व के अधिनायकवादी तंत्र को चुनौती देती है और एकलवाद के विरूद्ध बहुलतावाद का समर्थन करती है। पुराने 'केंद्रवाद' सभी क्षेत्रों में टूट जाते हैं और विकेंद्रीकरण का शाक्तितंत्र आकाश-मार्ग में धरती पर उतरता है उस पर अधिकार करता है। रक्तपात रहित अधिकार। यहाँ 'मसल' की जगह 'माइंड' ले लेता है। पुराने बुद्धिवाद के स्थान पर नव्य बुद्धिवाद व्यापार शिक्षा की पटरिया बैठता है। उसे पता है कि परिवर्तन एक इतिहास है और अर्थशास्त्रियों की प्रखर मेधा। सभी क्षेत्रों में विशेषीकृत ज्ञान फिसलकर सामान्य जन तक पहुँच रहा है। नवीन शक्ति तंत्र को गति दी-न्यू इलीट, कारपोरेट चीफ टेन्स, ब्यूरोक्रेट्स, मीडिया मुगल्स, मॉस प्रोडक्शन, मॉस डिस्ट्रीन्यूशन, मॉस एजूकेशन, मॉस कम्यूनिकेशन तथा मॉस डेमोक्रेसी ने मिलकर। (उत्तर-आधुनिकतावाद और दलित साहित्य-कृष्णदत्त पालीवाल, पृ-17) नतीजा यह हुआ कि 'ग्लोबल पॉवर' का बोलबाला हो गया अब व्यक्ति व समाज अपने को ग्लोबल सिनेरियों में देखने का अभिलाषी हो गया।

इसी तथ्य को 'कल्चर एंड इम्पीरियलिज्म' पुस्तक में सईद ने कहा कि अतीत के 'पाठ' का या 'पाठों' का एकांकी अध्ययन नहीं किया जा सकता। उन पाठों के 'कुपाठ' (नॉन टैक्स्च्चुअल) में जो दमित अर्थ है उसे उभारना-जगाना होगा ताकि वह पश्चिमी साम्राज्यवाद, नव-साम्राज्यवाद की बर्बरता की कहानी कह सके। अतः वे इस पूरे उत्तर-आधुनिक परिपेश से कलाओं और साहित्य के पुनर्पाठ की व्याख्या कर अतीत के पाठ को एक दृष्टिकोण प्रदान करना चाहते थे। 

भूमंडलीकरण, उदारवाद और बाजारवाद के विश्वव्यापी प्रसार के साथ चिंतन, कला, विचारधारा आदि में तीव्रता से परिवर्तन हुआ हैं। सम्पूर्ण विश्व में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से जो दो ध्रुवीय विचारधाराएँ अस्तित्व में आई उसने एक लम्बे समय तक संस्कृति, कला और राजनीतिक गतिविधियों को प्रभावित किया। 1993 के शीतयुद्ध के बाद की व्यवस्था से एक ध्रुव का खण्डित हो जाना तथा एक ही ध्रुव के महाशाक्ति रूप में जो परिवर्तन हुए कालान्तर में वहीं उत्तर-आधुनिक विचारधारा के प्रेरक तत्व बनें। इसने यूरोपीय केंद्रवाद को निर्ममता से शिव-धनुष की तरह तोड़ा। ये बहुकेंद्रीयता की उठानभरी अवस्था है। इस अवस्था में बूढ़ी रिटायर आधुनिकता की कसक है और सभी तरह के महाख्यानकों के टूटने-बिखरने की बेचैनी और कराह। 

जहाँ आधुनिकतावाद परिवेश के प्रति जागरूकता, वस्तुनिष्ठ दृष्टि, बौद्धिकता, यथार्थवाद और सामूहिक मुक्ति की भावना को लेकर चलता है। तथा जीवन के क्षेत्र में ऐतिहासिक दृष्टि को महत्त्व देता है, वहीं दूसरी ओर उत्तर-आधुनिकतावाद विज्ञान, समाज-विज्ञान, मानव-विज्ञान की वैज्ञानिक खोजों एवं दृष्टियों को अस्वीकार करता है। यौन-संबंधों में भी अस्वाभाविक एवं अप्राकृतिक मैथुन के रूपों को प्रमुखता देता है। स्त्री-पुरूष के बीच में समानतावादी लोकतांत्रिक संबंध के बजाए नारीवाद की वकालत करता है। व्यक्ति की वर्गीय एवं पेशेवर इमेज के बजाए नस्ल या सांप्रदायिक या धार्मिक इमेज को रूपायित करता है। (उत्तर-आधुनिकतावाद-जगदीश्वर चतुर्वेदी, पृ-50 ) तथा एक भिन्न तरह की सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों को जन्म देता है।

देवेंद्र इस्सर ने उत्तर-आधुनिक विमर्श को समेटते हुए- " इसे एक मनोदशा या माहौल ? प्रवृत्ति या परिदृश्य ? फैशन या विचार ? और अंत में सर्वोपरि रूप से विद्रोह या प्रतिविद्रोह अथवा साम्राज्यवादी षदीयंत्र या उत्पीडितों-अल्पसंख्यकों के मुक्ति-संघर्ष का आत्र्तनाद ? आदि कई पक्षों को लेकर विचार किया हैं। उनका कहना है कि उत्तर-आधुनिकता इन सबका मिला-जुला स्वर है जो पिछली सदी के छठे दशक में उठे नारी मक्ति, अश्वेतों के असंतोष, शांति मार्च, युवा विद्रोह, यौन मुक्ति जैसे मुक्ति-आंदोलनों से निकला है। " (समकालीन भारतीय साहित्य, उत्तर-आधुनिकता से संवाद, रवि श्रीवास्तव पृ-171, मई-जून-2008) उसने पुर्जागरण काल के बाद मूल्यों में आए परिवर्तन, व्यक्ति तथा समाज, उसके सांगठनिक रूप, राजनीति एवं राष्ट्रीयता आदि से जुड़े प्रायः स्वीकृत आदर्शों पर बुनियादी सवाल खड़े किए। उसकी तेज आँधी से, ज्ञान का हर कोना प्रभावित हुआ। समीक्षा के सिद्धांत, विचारधाराएँ और प्रतिमानों की प्रचलित प्रवृत्तियाँ-जो कुछ भी ठोस और स्थायी थे, पिघलकर हवा में उड़ गए। इस नए माहौल को उत्तर आधुनिकता कहा गया अर्थात् स्वीकृत प्रतिमानों को शंका के दायरे में खींचने की एक नई प्रवृत्ति।

उत्तर-आधुनिकता की प्रवृत्ति बहुत सरल नहीं है इसे एक सूत्र या समीकरण के रूप में बाँध पाना काफी कठिन हैं। इसके अपने नियम-कानून है, पक्ष-विपक्ष हैं। जहाँ एक ओर हम इसे एक ध्रुवीय दुनिया में सर्वशक्तिमान महाशक्ति की साम्राज्यवादी लिप्सा के विस्तार के रूप में देख सकते है तो दूसरी ओर इसे वंचितों के सत्तासंघर्ष तथा लोकतांत्रिक उपलब्धि के रूप में भी देखा जा सकता है। कभी तो यह भी कहा जाता है कि इस विमर्श में न कोई विचार अंतिम है न कोई विकास-व्यवस्था, साथ ही दूसरे किसी वैध-अवैध व नैतिकता से भी इसका कोई संबंध नहीं है। इसमें व्यक्ति को पूरी छूट है कि वह किसी तरह के अतियथार्थ और आभासी यथार्थ की रचना अपनी कल्पनाशक्ति के जरीये कर सकें। उसकी किसी भी सोच पर कोई प्रतिबंध नहीं है। पर ध्यान देने की बात है कि ये प्रवृत्ति समाज में कोई एक विचारधारा निर्मित नहीं कर पायेंगी, तब ऐसे में अराजकात की स्थिति उत्पन्न हो सकती है या फिर मैनेजर पाण्डे ने जैसे इसे एक उत्तर-आधुनिक विकल्प के रूप में तो देखा, लेकिन वे इसे माक्र्सवाद के स्थानान्तरण के रूप में स्वीकार करना नहीं चाहते। (देवेन्द्र चौबे, रेखा पाण्डे को दिए एक साक्षात्कार में .....) 

हालांकि उत्तर-आधुनिकता विमर्श की सिद्धांतिकी अत्यंत व्यापक भी है और जटिल भी। परंतु हम उसके इस पक्ष में जाते हुए अपनी रूचि का मुख्य बिंदु उन परिधि पर रहे हाशियाकृत समूहों को केन्द्र में लाने की सार्वजनीन स्वीकृति के रूप में देख सकते हैं। भारतीय साहित्य में आज दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श और आदिवासी विमर्श जैसी प्रवृत्तियों के उभार की व्याख्या को उत्तर-आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरता है। साथ ही उत्तर-आधुनिक विमर्श कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्रों की व्याख्या में अंतर्पाठीयता और पुनर्पाठ पर जोर देता है, जिसमें काफी पक्षों के खुलने की गुंजाईश है। यहाँ कोई एक पाठ अंतिम नहीं है और न ही स्वायत्त। अतः ऐसे में यह अधिक लोकतांत्रिक व्यवस्था का निर्माण कर सकता है।

उत्तर-आधुनिक विमर्श अनुपस्थिति को दर्ज करने वाला विमर्श है यानी जो कल तक अनुपस्थित था वह आज उपस्थित होने का संघर्ष कर रहा हैं। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पश्चिम में भारत को अनुपस्थित किया, पुरूष सत्ता ने स्त्री को, वर्ण व्यवस्था ने दलितों को, नेताओं ने जनता को, सभ्य समूहों ने आदिवासिरयों को, कट्टरपंथियों ने अल्पसंख्यकों को, इलेक्ट्रानिक मीडिया ने लोक कलाओं को तथा बड़े बाजार ने छोटी दुकानों को। उत्तर-आधुनिकता को साहित्य के संदर्भ में इन सब अनुपस्थितों की पुनः व्याख्या के साथ इनकी अभिव्यक्ति को पूरी लोकतांत्रिक शिष्टता के साथ स्वीकार किया जाय। 

स्त्री-विमर्श का संदर्भ-

हालांकि उत्तर-आधुनिकता के साथ ही स्त्री लेखन का आरम्भ हुआ, परन्तु इसकी पहचान का संकट हैं-इस लेखन में अभी भी समग्रता से स्त्री के विविध रूपों, स्तरों, परिप्रेक्ष्यों, वर्गों का चित्रण नहीं मिलता। ये विमर्श एक तरह का जनमत ( pressur ग्रुप)  निर्मित करना चाहता है ताकि अपने यथार्थ के बारे में समाज को बता सकें। उत्तर-आधुनिकता उसे यह स्पेस देती हैं। दूसरे इस वर्ग के पास अपनी भाषा का निर्माण नहीं हो पाया है ऐसे में स्त्री लेखिकाओं के पास अनेक विकल्प हैं ये चाहें तो परंपरागत मुख्यधारा में लिखें, चाहें तो पुरूषों की शैली या स्त्रियों की नकल करें। और चाहें तो इन परंपराओं को चुनौती दें। इन परंपराओं को बदलते हुए स्त्री पाठकों को संबोधित करें। अतः अपने अनुसार अपनी स्पेस का उपयोग करते हुए नये रूपों, भाषा, आदि का निर्माण करें। 

स्त्री-विमर्श ने अपने अन्य संदर्भों के साथ-साथ बड़ी बेबाकी से अपनी देह के कथनों को भी 
उजागर किया है। इसी संदर्भ में अनामिका की एक कविता के कुछ अंशों को रेखांकित किया जा सकता हैं-

" कुंडलिनी सी जगी बैठी थी
लड़की पलंग पर
उसकी सफेद फ्राक और जाघिए पर
किसी परी माँ ने काढ़ दिए थे
कत्थई गुलाब रात में ?
और सात बौने
क्यों गुत्थमगुत्थी
मचा रहे थे
आज उसके पेट में ?
अनहद सी
बज़ रही थी लड़की
कांपती हुई
लगातार थे
उसकी जंघाओं में
इक्तारे
चक्रों सा
काँप रही थी वह
एक महीयसी मुद्रा में
गोद में छुपाए हुए
सृष्टि के प्रथम सूर्य सा दीपित
लाल लाल तकिया..." 

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यह हिन्दी की शायद पहली कविता है जो प्रथम रजोस्त्राव  के अनुभव को एकाग्र करती हैं और उस वर्जित प्रदेश को विमर्श में ले आती है जिसका आखेट-'लज्जा' में कैद करके अब तक किया गया है। ऋतुमती होने का ऐसा 'ऐलीब्रेशन ' मूलतः सैक्सुअलिटी का नया दावा है। (उत्तर-यथार्थवाद- सुधीश पचौरी, पृ-304 ) अतः कई समय से वर्जित क्षेत्र पर स्त्री अपनी घुसपैठ बढ़ा रही है। वे भी अपने सब अनुभवों को संप्रेषित करना चाहती है। तथा इस उत्तर-आधुनिक विमर्श में इन सब मुद्दों के लिए स्पेस पा रही है। 

हिंदी में स्त्री केन्द्र अभी बनना है। भाषा में वह केन्द्र अभी आना है, विचारों की विविध श्रेणियों में उसका साक्षात्कार अभी होना है। हिन्दी में स्त्री केन्द्र के सम्भव होने की अपनी जटिल भारतीय अवस्थाएँ हैं। तीसरी दुनिया में पिछड़ेपन और विकास के प्रश्नों के साथ तकनीकी एवं उत्तर-आधुनिक जटिलताएँ भी सक्रिय हैं। वे बड़े बुनियादी वैचारिक संघर्षों को जन्म दे सकती है। महिलाओं की मुक्ति यहीं कहीं छिपी है। साहित्य संस्कृति का अगला वैचारिक-संघर्ष-बिन्दु यहीं से शुरू हो सकता है। भविष्य की भाषा दूर तक स्त्री केन्द्रीत हो सकती है अभी स्त्री को बोलना है। अपने एकांत को खोजना है। 

दलित विमर्श -

चूंकि दलित विमर्श मार्जिन पर ही है, वह स्वयं एक उत्तर-आधुनिक मार्जिन ही है, मेन स्ट्रीम नहीं है। मेन स्ट्रीम कोई है भी नहीं, जो है सो मेनस्ट्रीम यथार्थवाद यानी क्रिटीकल ब्राहमणवाद  है, इसलिए न तो यह विमर्श फैला न नीचे तक गया लेकिन इससे जो डिरुप्शन हुआ वह निशान छोड़ गया है। हिन्दी में उसे अपनी संपूर्ण ऊर्जा के साथ प्रकट होना है। अभी यह सुगबुगा रहा है। दलित विमर्श की लड़ाई मूलतः क्रिटीकल ब्राहृणवाद और ब्राहृणीकल रीयलिज्म से ही है, यद्यपि उसमें कई दलित ऐसे भी हैं जो ब्राहृणीकल रीयलिज्म से समझौता करते दिखते हैं। यह भविष्य के दलित की रचना-समस्या है।(उत्तर-यथार्थवाद-सुधीश पचौरी, पृ-202) दलितों ने अपनी दशा के लिए ब्रााहृणों को दोष दिया। ये इस विमर्श की सीमा रेखा हैं। 

आदिवासी संदर्भ - 

इस उत्तर-आधुनिक समय में GREEN HUNT (जंगल काटों) के चलते जो आदिवासियों को खदेड़ा जा रहा है जिसके परिणामस्वरूप आदिवासीय संस्कृति, समाज, कला, आदि पर जम कर प्रहार हो रहे है। वीर भारत तलवार की हाल में प्रकाशित किताब 'झारखंड के आदिवासियों के बीच : एक ऐक्टीविस्ट के नोट' पुस्तक झारखंड के विकास का प्रश्न उठाती है और बताती है कि किस तरह झारखंड के नाम पर झारखंड से दूर रहकर बनाई जा रही योजनाओं ने इस-पूरे इलाके को अन्याय और शोषण की बेदखली और विस्थापन की सौगात से भर दिया हैं। यह एक दोहरी मार है, जो आदिवासी झेलने पर मजबूर है। एक तरफ जो योजनाएँ बनीं उनमें इन इलाके की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों और आदिवासी समूहों की अलग किस्म की जीवनचर्या और जरूरतों का जरा भी ख्याल नहीं रखा गया। आदिवासी इलाकों में एक तरह का औपनिवेशिक विकास किया गया। आदिवासी इलाकों में प्राकृतिक संसाधनों और सस्ते श्रम का शोषण किया जा रहा है जो आदिवासियों के लिए अस्तित्व का संकट प्रस्तुत कर रहा है साथ ही इस आदिवासी संकट के साथ पर्यावरण संकट की स्थिति को भी जोड़कर देखा जाना चाहिए। कई भाषाओं के साहित्य के अतिरिक्त हिन्दी में भी कब आदिवासी जीवन उभर कर आ रहा हैं। रेत, जंगल जहाँ शुरू होता है, ठेरा बस्ती का सफर नामा, अल्मा कबूतरी आदि हाल ही में आदिवासी जीवन से संबंधित कई रचनाएँ अस्तित्व में आई हैं-जो आदिवासियों की संस्कृतिक, सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक अस्मिता के प्रश्न खड़े करती हैं। 
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साहित्यिक संदर्भ -

उत्तर-आधुनिकता ने साहित्य के संदर्भ को भी काफी प्रभावित किया, अब साहित्य 'पाठ' और 'पाठक' केन्द्रीत हो गया है। लेखक और आलोचक गायब हो रहे है। रोलां बार्थ कहते हैं कि पाठक का जन्म अनिवार्य रूप से लेखक की मृत्यु की कीमत पर होना चाहिए। यहां आकर हम समझ सकते हैं कि उत्तर-आधुनिकता की धारणा में 'अर्थ' न लेखक में होता है, न आलोचक में। 'अर्थ' पाठ में स्थित नहीं होता बल्कि वह 'पाठ' और 'पाठक' की अन्तः क्रिया द्वारा निर्धारित होता है। अतः न तो पाठ समान होते हैं और न एक पाठ अलग-अलग 'पठन' में समान होता है। इस दृष्टि से उत्तर-आधुनिकता का यह दावा है कि कोई भी रचना अन्य सभी रचनाओं (या पाठों) से सम्बद्ध होती है क्योंकि 'पाठ' संस्कृति के असंख्य केन्द्रों से लिए गए उद्धरणों का समुच्चय है। क्योंकि 'पाठ ऐसे ही होते हैं, इसलिए स्वाभाविक है कि सभी पाठ अन्तः सम्बन्धित होते हैं। पाठों की यह अन्तः सम्बन्धता अन्तः पाठीयता को जन्म देती है। उत्तर-आधुनिकता पाठ को पढ़ने की प्रक्रिया में 'पाठ' एक ओर कुछ कहता है तो दूसरी ओर कुछ छुपाता है या दबाता है। पाठ क्या कह रहा है की अपेक्षा क्या छुपा या दबा रहा है उसकी खोज महत्वपूर्णं है। 

भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारीकरण की आँधी के साथ ही भारतीय समाज कम्प्यूट्रीकरण, संचार-क्रांति और नव-उपिवेशवाद की गिरफ्त में आ गया। कुछ आन्तरिक अनिवार्यता और कुछ फैशन के स्तर पर हिन्दी उपन्यास साहित्य में गत बीस वर्षों में उत्तर-आधुनिक स्थितियों का चित्रण होने लगा। इस प्रकार के साहित्य लेखन में चार प्रकार के उपन्यासकारों की गणना की जा सकती है। 

·          - उत्तर-औद्योगिक युग की विकेन्द्रित मूल्यहीन व्यवहारवादी, पॉप-संस्कृतियों को आधार बनाकर लिखने वाले उपन्यासकार। इनमें मुख्य रूप से मनोहरश्याम जोशी और सुरेन्द्र वर्मा का नाम आता है। जोशी के चार उपन्यास 'कुरू-कुरू स्वाहा, हमजाद, कसप तथा हिरया हरकयूलिस की हैरानी' को लिया जा सकता है। सुरेन्द्र वर्मा का 'मुझे चाँद चाहिए' भी ऐसा ही उपन्यास है। 
·         -दूसरे प्रकार के उपन्यासकार वे हैं जो उत्तर-आधुनिक विकास की अवधारणा को गरीबों/ ग्रामीणों/ पिछड़े वर्गों के लिए विनाशकारी मानते रहें। वीरेन्द्र जैन के दो उपन्यास 'पाए' और 'डूब' को इस श्रेणी में रखा जा सकता हैं। 
·         -तीसरे प्रकार के वे उपन्यासकार हैं जो कि आधुनिकता के दौर में साहित्य में उपेक्षित अनुपस्थित अथवा बहिष्कृत पात्रों, परिस्थितियों अथवा कथानकों को साहित्य में ला रहे है। नारीवादी, दलित तथा अन्य जनजातीय क्षेत्रों से जुड़ें उपन्यासों को इसमें लिया जा सकता है। मैत्रेयी पुष्पा का 'इदन्नमम', प्रभा खेतान का 'छिन्नमस्ता' कृष्णा सोबती का 'दिलो दानिश' अनामिका का 'तिनका तिनके पास' आदि को लिया जा सकता है। 
·         -चौथी तरह के उपन्यासकार वे हैं जो कि मिथकों को तोड़ कर उनमें नए अर्थ भर रहे हैं या फिर मिथकों का नए ढंग से विश्लेषण कर रहे हैं। भगवान सिंह का 'अपने-अपने राम' तथा नरेन्द्र कोहली के रामायण और महाभारत पर आधारित उपन्यास ऐसे ही हैं। 

कहानीकार उदयप्रकाश के शब्दों में अगर कहें- 'उत्तर-आधुनिकता' तो परवर्ती पूंजीवाद द्वारा उछाला गया एक नया दार्शनिक विकल्प है। इसने इतिहास और विचारधारा के अंत की घोषणा की थी लेकिन यूरोप में स्वयं इसी का अंत हो गया है। अब आजकल वहाँ 'फिलासफी ऑफ केयास' (विसंगतियों या अराजकता का दर्शन) का बोलबाला है। उनका मानना है कि सभी तरह की वैचारिक सरणियाँ और सामाजिक व्यवस्थाएँ नाकाफी और निकम्मी हो चुकी हैं। लिहाजा 'हिन्दी कहानी के लिए उत्तर-आधुनिकता की प्रासांगिकता इस अर्थ में है कि वह भारतीय समाज और जनता को उसकी अमानुषिक परिणति का अहसास कराए, जैसा उदयप्रकाश ने 'पॉल गोमरा का स्कूटर' में कराने का प्रयास किया है। किन्तु ऐसी कहानियाँ इधर नहीं लिखी जा रही हैं जो उत्तर-आधुनिक विमर्श की विरोधी मुद्रा में खड़ी हो सकें। साहित्यकारों का एक वर्ग इस विमर्श का हिमायती है। इस कहानी के मुख्य पात्र हिन्दी कवि पॉल गोमरा के माध्यम से उत्तर-आधुनिक समाज में चतुर्दिक ध्वंस और बाजारवादी युग की अमानवीयता का एहसास कराया गया है। पॉल गोमरा कथित उत्तर-आधुनिक यथार्थ के प्रतिनिधि रूप में नहीं बल्कि उस प्रतिनिधि के रूप में आए हैं जिनका यह उत्तर-आधुनिक उपभोक्तावाद और बाजार तंत्र लगातार गला घोंट रहा है बस उसके हाथ दिखायी नहीं पड़ते। 

मनोहरश्याम जोशी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से कई उत्तर-आधुनिक तत्त्वों का प्रयोग किया है। मनोहरश्याम जोशी ने हरिया से एक साथ कई खेल कर दिए हैं ( उत्तर-यथार्थवाद-सुधीश पचौरी, मीठी सड़ांध, पृ-153) - 

·         -उन्होंने कथा के भोलेपन का अन्त कर दिया है (यही वोद्रीआ की 'छलना' है)। 
·         -उन्होंने तर्कसंगत, वस्तुगत ज्ञान-अज्ञान के कवित भेद को हरिया के जरिए पिटा दिया है। 
·         -उन्होंने पूँजी (पिटार), काम (लिंग, गूमालिंग) और विभक्त-अविभक्त चित्र के भेद मिटा दिए हैं।
·         -उन्होंने विमर्श की भाषा को वृत्तान्त की भाषा बना दिया है, वृत्तान्त को विमर्श। सारी कहानी बातचीत में नहीं, बातचीत की भाषा में चलती है। एक बिरादरी को बिरादरियत की हिफाजत के साथ। 
·         -हर पाठक अपना पाठ पा सकता है कहानी में। 

संदर्भ ग्रन्थ और पत्रिकाएँ-
1. उत्तर-आधुनिकता कुछ विचार., संपादन देवी शंकर नवीन एवं सुशान्त कुमार मिश्र
2. अंतिम दो दशकों का हिन्दी साहित्य
3. अद्य-पाद्य विन्यास-सुधीश पचौरी
4. उत्तर-यथार्थवाद-सुधीश पचौरी
5. उत्तर-आधुनिकतावाद-जगदीश्वर चतुर्वेदी
6. उत्तर-आधुनिकतावाद और दलित साहित्य-कृष्णदत्त पालीवाल

पत्रिकाएँ-
1. कथादेश-जुलाई 2009-विचारधारा का संकट और स्त्री-विमर्श का लोकतंत्र-विनोद शाही
2. कथादेस -'हिन्द स्वराज्य' की शती पर गाँधी का उत्तर आधुनिक बोध, वीरेन्द्र कुमार बरनवाल
3. समकालीन भारतीय साहित्य -मई-जून 2008, उत्तर आधुनिकता से संवाद, रवि श्रीवास्तव




पंकज 'वेला'
एम.ए. गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग 
महात्मा गांधी अंतर्राष्तीय हिंदी विश्वविधयालय ,वर्धा


Thursday, 25 October 2018

दोषी कौन? मैकाले या हम?


25अक्टूबर ,2018
मैकाले के जन्म दिवस पर 




                                                        दोषी कौनमैकाले या हम?


अपनी वर्तमान शिक्षा की जिन बातों को लेकर समाज में असंतोष है उनमें से एक है "शिक्षा के माध्यम" के रूप में अंग्रेजी का बढ़ता प्रयोग. एक विषय के रूप में अंग्रेजी की आवश्यकता के प्रति तो राजा राम मोहन राय जैसे नेता ही जागरूक कर चुके थे, जिसने कहीं-कहीं माध्यम का रूप भी ले लिया था, फिर भी अंग्रेजी का शिक्षा के माध्यम के रूप में अधिकृत और व्यवस्थित प्रयोग लार्ड मैकाले के उस विवरण पत्र (1835) का परिणाम था जो उसने ब्रिटेन की संसद के नए आज्ञा-पत्र (चार्टर 1833) को व्यावहारिक रूप देने के लिए तैयार किया था। आज्ञा-पत्र को अंतिम रूप देने से पहले ही ईस्ट इंडिया कंपनी के डायरेक्टरों ने अपना मंतव्य स्पष्ट करते हुए 5 सितम्बर 1827 को गवर्नर जनरल को पत्र में लिखा कि शिक्षा के लिए निर्धारित धन उच्च और मध्य वर्ग के ऐसे भारतीयों की शिक्षा पर ही खर्च किया जाए जो हमारे शासन के लिए "एजेंट" का काम करें। उस समय स्कूल चलाने वाले प्राय: तीन तरह के लोग थे :
Ø कंपनी के कर्मचारी/व्यापारी, जो अपने बच्चों के लिए इंग्लैंड के स्कूलों जैसी शिक्षा देना चाहते थे।
Ø ईसाई मिशनरी जो मुख्य रूप से ईसाई धर्म की शिक्षा देते थे। मिशनरियां धर्म प्रचार का काम सामान्यतया समाज के निर्धन लोगों के बीच करती थीं। अत: वे अपनी शिक्षा में किसी व्यवसाय की शिक्षा भी शामिल करते थे ताकि धर्मान्तरित लोगों का आर्थिक स्तर सुधर सके, और
Ø भारतीय जिसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों थे जिनमें से क्रमश: पाठशाला/आश्रम, मकतब/मदरसे वाली शिक्षा देना चाहते थे।

यों तो इन सभी की नज़र उक्त राशि पर लगी हुई थी,मगर ईसाई मिशनरी इस पर अपना विशेषाधिकार समझते थे।
          मैकाले के सम्बन्ध में यह जान लेना उपयोगी होगा कि जब ब्रिटिश पार्लियामेंट ने "गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट 1833" पास किया तो मैकाले को गवर्नर जनरल काउन्सिल (जिसे सुप्रीम काउन्सिल ऑफ़ इंडिया कहते थे) का विधि सदस्य (law member) नियुक्त किया। अत: मैकाले 1834 में भारत आया। यहाँ उसे "कमेटी ऑफ़ पब्लिक इंस्ट्रक्शन" का अध्यक्ष भी बनाया गया। इस कमेटी में दस सदस्य थे जिनमें से आधे सदस्य तो संस्कृत, फारसी, अरबी की शिक्षा जारी रखने के समर्थक थे, पर शेष आधे अंग्रेजी की और यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने के पक्ष में थे। इस विवाद को समाप्त कंपनी के कर्मचारी और करने और कंपनी के डायरेक्टरों की इच्छा को लागू करने की दृष्टि से मैकाले ने अपने विवरण-पत्र में तीन नीतिगत बातें कहीं :
1. हमें अपना राज्य सुदृढ़ करने के लिए ऐसे लोग चाहिए जो रक्त और रंग में तो भारतीय हों, पर रुचियों में, दृष्टिकोण में, नैतिकता में और बुद्धि में अँगरेज़ हों. ऐसे लोग तभी तैयार किए जा सकते हैं जब उन्हें यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा दी जाए. अत: हमें यह राशि "यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान" (इसी को अब हम लोग "आधुनिक ज्ञान-विज्ञान" कहने लगे हैं) के प्रसार पर खर्च करनी चाहिए।
2. इसके लिए अंग्रेजी को ही शिक्षा का माध्यम बनाना होगा क्योंकि भारतीय भाषाएँ इतनी अविकसित और गंवारू हैं कि उन्हें यूरोपीय भाषाओं से संपन्न किए बिना उनमें यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान का अनुवाद तक संभव नहीं।
3. यह शिक्षा सबको नहीं, समाज के केवल विशिष्ट वर्ग को देनी चाहिए। यह विशिष्ट वर्ग ही इस ज्ञान-विज्ञान का प्रसार देश के अन्य लोगों में देशी भाषाओं के माध्यम से (कृपया इन शब्दों पर ध्यान दें, "देशी भाषाओं के माध्यम से") कर लेगा। इसे ही शिक्षा-शास्त्र की पारिभाषिक शब्दावली में "अधोमुखी निस्यन्दन सिद्धांत (downward filtration theory)" कहते हैं। मैकाले के निम्नलिखित शब्द ध्यान देने योग्य हैं
          "We must at present do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern… a class of persons Indian in blood and colour , but English in tastes, in opinions, in morals and in intellect. To that class we may leave it to refine the vernacular dialects of the country, to enrich those dialects with terms of science borrowed from western nomenclature, and to render them by degrees fit vehicles for conveying knowledge to the great mass of the population.” (Selections from Educational Records, Part-1, Edited by H. Sharp; Reprint Delhi : National Archives of India, 1965, Pages 107 – 117 )
          शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग अंग्रेजी शासन-काल में ही स्वयं मैकाले की दृष्टि में कोई "स्थायी व्यवस्था" नहीं, केवल "तात्कालिक अस्थायी व्यवस्था" थी क्योंकि मैकाले का अंतिम उद्देश्य सामान्य जनता में यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान का प्रसार "देशी भाषाओं के माध्यम" से करना था, पर हमने "स्वतंत्र भारत" में अंग्रेजी माध्यम को ही "स्थायी व्यवस्था" बना दिया. तो अस्थायी व्यवस्था को स्थायी बनाने का अपराधी कौन है? मैकाले या हम?
          गवर्नर जनरल बेंटिंक ने इस विवरण पत्र को स्वीकार कर लिया। साथ ही, अंग्रेजी शिक्षा के प्रति भारतीयों को आकर्षित करने, कंपनी के माल की बिक्री बढ़ाने तथा कंपनी का व्यय कम करने की दृष्टि से उसने कंपनी की सरकारी नौकरी में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों को कम वेतन पर ऊँचे पद देने शुरू कर दिए। पुर्तगाली, फ्रांसीसी, डच और अँगरेज़ इस देश के उद्योग-धंधों को जिस तरह नष्ट कर चुके थे और परिणामस्वरुप अर्थ व्यवस्था की जो दुर्दशा हो चुकी थी (उक्त यूरोपीय जातियों के आने से पहले इस देश की जो आर्थिक स्थिति थी, विश्व व्यापार में उसका जो स्थान था और इन जातियों ने जिस तरह से उस सबको नष्ट किया - उसका विस्तार से अध्ययन सुन्दर लाल की "भारत में अंग्रेजी राज", रमेश चन्द्र दत्त आई.सी.एस. की "भारत का आर्थिक इतिहास", सुरेन्द्र नाथ गुप्त की "सोने की चिड़िया और लुटेरे अंग्रेज़" जैसी पुस्तकों में किया जा सकता है), उसके परिप्रेक्ष्य में नौकरी का आकर्षण अत्यंत स्वाभाविक ही था। अत: भारत के विशाल मध्यम वर्ग में अंग्रेजी शिक्षा की मांग बढ़ने लगी। शायद इसीलिए मैकाले के विवरण-पत्र को कुछ शिक्षा-शास्त्री "मील का पत्थर" कहते हैं, तो कुछ इसे "खतरनाक रपटीला मोड़" बताते हैं।
आर्थिक दृष्टि से जर्जर होते समाज में हमें अंग्रेजी कल्पवृक्ष की सुखद छाया जैसी प्रतीत हुई जहाँ सरकारी नौकरी के सारे ऐशो- आराम तुरंत मिल सकते थे.
          इस विवरण से यह तो स्पष्ट ही है कि भारत में शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग अंग्रेजी शासन-काल में ही स्वयं मैकाले की दृष्टि में कोई "स्थायी व्यवस्था" नहीं, केवल "तात्कालिक अस्थायी व्यवस्था" थी क्योंकि मैकाले का अंतिम उद्देश्य सामान्य जनता में यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान का प्रसार "देशी भाषाओं के माध्यम" से करना था, पर हमने "स्वतंत्र भारत" में अंग्रेजी माध्यम को ही "स्थायी व्यवस्था" बना दिया। तो अस्थायी व्यवस्था को स्थायी बनाने का अपराधी कौन है? मैकाले या हम? हमने तो जापान, कोरिया, चीन जैसे देशों तक से कुछ सीखने का प्रयास नहीं किया जिन्होंने यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान पहले यूरोपीय भाषाओं में सीखा अवश्य, पर फिर उसे अपनी भाषाओं के माध्यम से अपने देश में फैलाकर विश्व के प्रमुख देशों में अपना स्थान सुरक्षित कर लिया। जापान ने जब 19वीं शताब्दी के अंत में अपनी शिक्षा को नई चाल में ढालने का प्रयास किया तो अनेक युवाओं को पढ़ने के लिए यूरोप-अमरीका भेजा, जिन्होंने वापस आकर उस ज्ञान को अपने देश में जापानी भाषा के माध्यम से ही फैलाया.
          ज्ञान-विज्ञान का माध्यम जब कोई विदेशी भाषा होती है तो उसके तमाम शब्द हमें रटने पड़ते हैं क्योंकि उनके अर्थ हम नहीं समझते. इसके विपरीत अपनी भाषा के शब्दों के अर्थ में एक पारदर्शिता होती है। जैसे, अंग्रेजी का "affidavit" तो हम रटते हैं, पर उसके लिए हिन्दी शब्द "शपथ पत्र" का अर्थ अपने आप में स्पष्ट हो जाता है। यही कारण है कि जापानियों ने यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान के लिए अपने शब्द बनाकर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान अपने देशवासियों के लिए बोधगम्य बना दिया। जैसे, "बैरोमीटर" को वे sei-u-kei (धूप-वर्षा मापक), या "एस्बेस्टस" को द्मड्ढत्त्त् -थ्र्ड्ढद (पत्थर की रुई) कहते हैं। जापान जैसे देशों की प्रगति का यह मूल रहस्य है। मैकाले और बेंटिंक की उन नीतियों का ही यह परिणाम है कि अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने के बाद हम सामान्यतया रक्त और रंग से ही "भारतीय" बचे रह जाते हैं, रुचियों और दृष्टिकोण से नहीं। तभी तो हमारे लिए ज्ञान-विज्ञान का अर्थ और इतिहास "यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान" से ही शुरू होता है और वहीं खत्म. मैकाले विशिष्ट वर्ग को ही शिक्षा देना चाहता था, हम स्वतंत्र होने और देश पर "जनतंत्र" का लेबल लगाने के बाद भी शिक्षा की ऐसी ही योजनाएँ बनाते हैं जिनसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा विशिष्ट वर्ग के लिए ही आरक्षित रहे। जिन "अविकसित और गंवारू" भारतीय भाषाओं को विकसित करने की ज़िम्मेदारी मैकाले ने हम पर डाली थी, हमने केवल उस ज़िम्मेदारी से नहीं, उन भाषाओं से भी अपना नाता तोड़ लिया है।
          मैकाले-बेंटिंग की नीतियों के हमने नए-नए आयाम ढूंढ लिए हैं। उन्होंने अंग्रेजी को "यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान प्राप्त करने का साधन" बताया था, हमने उसे "सरकारी नौकरी का लाइसेंस" मानकर अपनाया. आर्थिक दृष्टि से जर्जर होते समाज में हमें अंग्रेजी कल्पवृक्ष की सुखद छाया जैसी प्रतीत हुई जहाँ सरकारी नौकरी के सारे ऐशो-आराम तुरंत मिल सकते थे। परिणाम यह हुआ कि "अंग्रेजी" तो देश के कोने- कोने में फैल गई, पर "ज्ञान-विज्ञान" लुप्त हो गया। यही कारण है कि आधुनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्ति भी आज तक अज्ञान, अविद्या, अंधविश्वास की उन्हीं अंधी गलियों में भटक रहा है जिनमें आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से अनभिज्ञ व्यक्ति भटकता रहता है। अंग्रेजी पढ़ा सामान्य व्यक्ति ही नहीं, विज्ञान का प्रोफ़ेसर, डॉक्टर, इंजीनियर भी किन्हीं अदृश्य शक्तियों से इतना अधिक आतंकित है कि अपने नए मकान की रक्षा के लिए मकान पर काली हांडी लटकाना आवश्यक मानता है।
अपनी रक्षा के लिए हाथ की अँगुलियों में रंग-बिरंगे पत्थरों वाली अंगूठियाँ पहनता है। भौगोलिक तथ्यों को जानते हुए भी सूर्य/चन्द्र ग्रहण के अवसर पर देवताओं को संकट से उबारने के लिए स्नान-ध्यान-पूजा-पाठ करता है। "पंडितों" को खाना खिलाकर अपने "स्वर्गस्थ" पितरों का पेट भरता है। ऐसी ही मानसिकता के कारण वह तो कंप्यूटर का उपयोग भी "जन्मपत्री" तैयार करने के लिए करता है। जो अंग्रेजी आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की वाहिका बताई गई थी, उसका हमने ज्ञान-विज्ञान से तो सम्बन्ध-विच्छेद कर दिया, पर रुचियों में अँगरेज़ होने का प्रमाण देते हुए अंग्रेजी को पूरी श्रद्धा से इस तरह अपना लिया कि केवल नौकरी के काम नहीं, बल्कि अपने निजी और सामाजिक जीवन के छोटे-बड़े काम भी उसी भाषा में करने लगे। हम तो उसे मंदिर की देवी मानकर उसकी पूजा करने लगे हैं। तभी तो विवाह जैसे जीवन के अत्यंत महत्त्वपूर्ण अवसर के निमंत्रण पत्र हों या दीपावली, नव वर्ष, विवाह की वर्षगांठ, जन्मदिवस जैसे अवसरों के शुभकामना सन्देश, घर के दरवाजे पर लगने वाला नामपट हो या दुकान पर लगने वाला बोर्ड, छोटी-मोटी गोष्ठी में बात करनी हो या संसद में चर्चा, हिन्दी फिल्मों/नाटकों के पुरस्कार वितरण समारोह हों या संगीत आदि के कार्यक्रम - हम सभी काम अंग्रेजी में करते हैं। अब तो धार्मिक प्रवचन भी हम अंग्रेजी में करने लगे हैं। जहाँ तक नौकरी का संबंध है, पहले वह सरकारी क्षेत्र में ही अंग्रेजी के माध्यम से मिलती थी, पर कालांतर में निजी क्षेत्र को भी सरकार का अनुसरण करना पड़ा. इसके बावजूद लोगों का विश्वास था कि स्वतंत्रता मिलने पर स्थिति अवश्य बदलेगी. इस विश्वास का ही परिणाम था कि जब देश को आज़ादी मिलनी निश्चित हो गई, तो प्रसिद्ध उद्योगपति टाटा ने मुंबई में अपने वरिष्ठ अधिकारियों को हिन्दी सिखाने की व्यवस्था की; पर जब संविधान-सभा ने अंग्रेजी जारी रखने का निश्चय कर लिया तो टाटा ने भी हिन्दी सिखाने की व्यवस्था समाप्त कर दी। संविधान-सभा के निर्णय ने सामान्यजन को यह स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया कि देश भले ही स्वतंत्र हो गया हो, अगर सम्मान के साथ जीना है तो अंग्रेजी की ऑक्सीजन पर ही जीना होगा क्योंकि देश अंग्रेजों के शासन से ही आज़ाद हुआ है, अंग्रेजी के शासन से नहीं
          आज नौकरी मिले या न मिले, पर अंग्रेजी के चक्कर में हम "शिक्षा का अर्थ और उसका उद्देश्य" जैसी सब बातें भूल चुके हैं। शिक्षा-शास्त्री पुकार-पुकार कर कहते आ रहे हैं कि बच्चे के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावात्मक आदि सभी प्रकार के विकास के लिए मातृभाषा/क्षेत्रीय भाषा के माध्यम से शिक्षा देना अनिवार्य है। चाहे ब्रिटिश काल के हंटर कमीशन (1882), सैडलर कमीशन (1917) आदि हों या स्वतंत्र भारत के राधाकृष्णन कमीशन (1948), मुदालिअर कमीशन (1952), कोठारी कमीशन (1964) आदि हों, शिक्षा सम्बन्धी सभी आयोगों ने एक स्वर से यही सिफारिश की है कि माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा (जो जीविकोपार्जन हेतु स्वत: पूर्ण भी हो) अनिवार्य रूप से मातृभाषा/क्षेत्रीय भाषा के ही माध्यम से देनी चाहिए, पर हमारा अंग्रेजी-प्रेम इन बातों को सुनना ही नहीं चाहता. कहा ही गया है कि प्रेम अंधा-बहरा होता है। परिणाम यह हुआ है कि अंग्रेजी माध्यम की जो परम्परा ज्ञान-विज्ञान की खोज के लिए समर्पित विश्वविद्यालयों से शुरू हुई थी, वह धीरे-धीरे माध्यमिक और प्राथमिक से होते हुए अब नर्सरी - प्रि-नर्सरी स्कूलों से भी आगे बढ़कर घरों में घुस आई है जहाँ दुध-मुँहे बच्चों की भाषा सीखने की शुरुआत hand, finger, eyes, ear, nose, से और गिनती की शुरुआत one, two... से होने लगी है। अभी तक हम यही सोचते थे कि इस प्रकार अंग्रेजी माध्यम का प्रयोग शिक्षा सम्बन्धी सभी आयोगों की सिफारिशों के विपरीत है, पर अब तो अंग्रेजी प्रेमियों के प्रवक्ता बनकर हमारे स्वतंत्र भारत के "Knowledge Commission' (पाठक क्षमा करें, पर डर है कि कहीं इसे देवनागरी लिपि में लिखना या हिंदी में "ज्ञान आयोग" कहना इसका अपमान न हो जाए) के चेयरमैन मि. सैम पित्रोदा ने स्पष्ट सिफारिश की है कि पूरे देश में हर प्रकार की शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी ही होना चाहिए। सैम पित्रोदा और उन जैसे "विद्वानों" ने मान लिया है कि शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग ही आज अलादीन का वह जादुई चिराग है जो शिक्षा के प्रसार की कमी, शिक्षा की गिरती गुणवत्ता, बेरोज़गारी आदि तरह- तरह की सभी समस्याओं को हल करके हमारी सभी मनोकामनाएं पूर्ण कर सकता है।
    लोगों ने मान लिया है कि अंग्रेजी माध्यम से दी गई शिक्षा की गुणवत्ता उच्च स्तर की, और भारतीय भाषा माध्यम की निम्नस्तर की होती है। विभिन्न बोर्डों की परीक्षाओं में या अखिल भारतीय प्रतियोगी परीक्षाओं में जब कभी भारतीय भाषा माध्यम के बच्चे "टाप" करते हैं तो दिलजले लोग उसे "अंधे के हाथ बटेर" कह देते हैं। वे इसे मातृभाषा का प्रभाव मानने को तैयार ही नहीं। उनकी इस मानसिकता के कारण देश के सीमित संसाधन और अमूल्य शक्ति गाँव-गाँव में तथाकथित इंग्लिश मीडियम के स्कूल खोलने में नष्ट हो रही है।
    लोग बड़े आग्रहपूर्वक कहते हैं कि आज के युग में अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है। उनके इस कथन से असहमति का तो प्रश्न ही नहीं, क्योंकि कतिपय कामों के लिए अंग्रेजी का ज्ञान वास्तव में आवश्यक हो गया है, पर इस तथ्य की उपेक्षा कैसे कर दी जाए कि "अंग्रेजी की शिक्षा" और "अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा" एक दूसरे के पर्याय नहीं हैं। आज के युग में अंग्रेजी का ज्ञान केवल हमारे लिए नहीं, विश्व के अन्य लोगों के लिए भी आवश्यक है। इसीलिए रूसी, चीनी, जापानी, फ्रांसीसी, जर्मन, स्पेनिश आदि वे लोग भी अंग्रेजी का अध्ययन कर रहे हैं जिनकी मातृभाषा अंग्रेजी नहीं है, पर वे अपनी सारी शिक्षा की व्यवस्था "अंग्रेजी माध्यम से" नहीं करते. आज विश्व में केवल आर्थिक नहीं, अन्य भी अनेक दृष्टियों से जो स्थान जापान, कोरिया, चीन आदि देशों का है, हमारा देश उनसे हर क्षेत्र में दूर, बहुत दूर, बहुत ही दूर केवल इसलिए है क्योंकि हमने अपने बच्चों के विकास के मार्ग में अंग्रेजी माध्यम की दीवार खड़ी कर रखी है। इस सच्चाई को हम जितनी जल्दी समझ लें, उतना ही अच्छा है।
    अपने अंग्रेजी-प्रेम के कारण हम भावी पीढ़ी के प्रति अनेक "अपराध" करते आ रहे हैं। हम यह भूल गए हैं कि जहाँ तक भाषा सीखने का प्रश्न है वह कक्षा-कक्ष में कम, "विशिष्ट भाषायी परिवेश" में अधिक सीखी जाती है। बच्चा स्कूल में अंग्रेजी "पढ़कर" आता है, पर उस पढ़े हुए को "सीखने" के लिए उसे अंग्रेजी का परिवेश मिलता ही नहीं। जो परिवेश मिलता है वह या तो पूरी तरह मातृभाषा/क्षेत्रीय भाषा का होता है, या फिर मिश्रित. अत: बच्चे का अंग्रेजी पर अपेक्षित अधिकार हो ही नहीं पाता. हमारी आज की फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन की पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में हुई। उनके पिता डॉ. हरिवंश राय "बच्चन" अंग्रेजी के ही एम.ए. थे, पी-एच.डी. थे, और वह भी इंग्लैंड से. इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के ही शिक्षक थे। माँ तेजी बच्चन भी अंग्रेजी की ही एम.ए. थीं और अपने समय के अंग्रेजी के अप्रतिम विद्वान् प्रो. अमरनाथ झा की शिष्या थीं। दूसरे शब्दों में, अमिताभ को विद्यालयी और पारिवारिक दोनों ही प्रकार के परिवेश अंग्रेजी सीखने की दृष्टि से अनुकूलतम मिले। इसके बावजूद उनका अंग्रेजी पर अपेक्षित अधिकार नहीं हो पाया. अपने "ब्लॉग" में उन्होंने लिखा है कि मैं अंग्रेजी व्याकरण में कमजोर था। इसलिए सेंट स्टीफन कॉलेज (दिल्ली) के प्रिंसिपल के कहने के बावजूद बी.ए. (आनर्स) अंग्रेजी में नहीं किया (राष्ट्रीय सहारा, दिल्ली, 11 अगस्त, 2009, पृष्ठ 15). हर बच्चे को तो वैसा भी पारिवारिक परिवेश नहीं मिल सकता जैसा अमिताभ को मिला। अत: सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इन बच्चों को अंग्रेजी पर आधा-अधूरा अधिकार पाने के लिए भी कितना संघर्ष करना पड़ता होगा और उसके बाद भी इस पीड़ा को जन्म भर ढोना पड़ता होगा कि मुझे ठीक से अंग्रेजी नहीं आती. सैम पित्रौदा तो अमरीका में बस चुके हैं, उन्होंने वहां अध्ययन भी किया है, पर इस देश का हर बच्चा न विदेश जा सकता है न वहां अध्ययन कर सकता है।
    विश्व में केवल आर्थिक नहीं, अन्य भी अनेक दृष्टियों से जो स्थान जापान, कोरिया, चीन आदि देशों का है, हमारा देश उनसे हर क्षेत्र में दूर, बहुत ही दूर केवल इसलिए है क्योंकि हमने अपने बच्चों के विकास के मार्ग में अंग्रेजी माध्यम की दीवार खड़ी कर रखी है.
    स्वतंत्र भारत में शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग देश को दो भागों में बाँट रहा है - "इंडिया" और "भारत". महात्मा गाँधी ने जो बात राजभाषा के सन्दर्भ में कही थी, आज वह शिक्षा के माध्यम के बारे में भी उतनी ही सही है।
    हमने मनोवैज्ञानिकों की बताई इस बात को भी भुला दिया है कि बाल्यावस्था में भाषा सीखने का अर्थ केवल कुछ शब्द रट लेना नहीं है। बाल्यावस्था में तो भाषा के माध्यम से बच्चे के मन में "संकल्पनाओं" के निर्माण की, "अमूर्तीकरण" की प्रक्रिया शुरू होती है जो उसके मानसिक विकास का, चिंतन और विचार करने का अर्थात् भावी जीवन का आधार होती है, नींव होती है। अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा के कारण बच्चों में यह प्रक्रिया बाधित होती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर राष्ट्रपिता ने कहा था, अगर हम अंग्रेजी के आदी नहीं हो गए होते तो यह समझने में हमें देर नहीं लगती कि अंग्रेजी के शिक्षा के माध्यम होने से हमारी बौद्धिक चेतना जीवन से कटकर दूर हो गई है, हम अपनी जनता से अलग हो गए हैं”। अंग्रेजी के कारण जनता से अलग होने का ही एक उदाहरण है भोपाल गैस दुर्घटना जैसी त्रासदी से पीड़ित जनता के दर्द को महसूस करने के बजाय हमारे नेताओं का पीड़ा देने वाले लोगों को बचाने का भरसक प्रयास करना या जनता के खून- पसीने की कमाई "चुराकर" विदेशों में अपने नाम से जमा करना।    इस वास्तविकता की भी हमने पूरी तरह उपेक्षा कर दी है कि हर सामान्य बच्चे में मातृभाषा (प्रथम भाषा) सीखने की जैसी क्षमता जन्मजात होती है वैसी दूसरी, तीसरी, चौथी... भाषा सीखने की नहीं होती. हमने तो अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा की व्यवस्था करके हर बच्चे पर यह जिम्मेदारी डाल दी है कि अंग्रेजी पर मातृभाषा जैसा अधिकार अर्जित करो। इसमें असफल रहने पर हम बच्चे को "पिछड़ा हुआ", "फिसड्डी", "नालायक", "अयोग्य", "मंद बुद्धि" घोषित कर देते हैं। लगभग चार दशक पूर्व जब मैं विश्वविद्यालय में शिक्षक था, तब मैंने एक शोध के माध्यम से कतिपय माध्यमिक शिक्षा बोर्डों के पाठ्यक्रमों/परीक्षा परिणामों का विस्तृत अध्ययन किया था जिसके निष्कर्ष विभिन्न शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुए थे। उस समय कई बोर्डों में अंग्रेजी के दो कोर्स थे - अनिवार्य अंग्रेजी (सबके लिए) और वैकल्पिक अंग्रेजी (जो स्वेच्छा से इसे पढ़ना चाहें उनके लिए). अनिवार्य अंग्रेजी का परीक्षा परिणाम जहाँ 45 से 58 प्रतिशत तक रहा, वहीं वैकल्पिक अंग्रेजी का 88 से 97 प्रतिशत तक रहा। परीक्षा परिणाम के इस अंतर के कारणों का विश्लेषण करने पर ध्यान गया कि वैकल्पिक अंग्रेजी का अध्ययन वही करता है जो इसका लाभ अपने भावी जीवन में देख रहा है, इसलिए जिसकी रुचि इस भाषा के सीखने में है और जिसे इसके लिए सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं। इसके विपरीत अनिवार्य अंग्रेजी का अध्ययन रुचिशील-अरुचिशील, सामर्थ्यवान-सामर्थ्यहीन, सुविधा प्राप्त- सुविधाहीन सभी को विवशता में करना पड़ता है। यही कारण है कि अनिवार्य अंग्रेजी का परीक्षा परिणाम अनिवार्य गणित (58-79 प्रतिशत) और अनिवार्य सामान्य विज्ञान (62-75 प्रतिशत) तक से कम रहा, जबकि गणित और विज्ञान कोई सरल विषय नहीं। जरा विचार कीजिए कि जब एक विषय के रूप में अंग्रेजी की अनिवार्यता लगभग आधे बच्चों को असफल रहने के लिए मजबूर कर रही है तो शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी की अनिवार्यता कितने बच्चों का भविष्य चौपट कर रही होगी - यह सहज कल्पना का विषय है या गहन अनुसन्धान का? 
   अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चों की प्रकृति-प्रदत्त शक्तियों का अधिकाधिक विकास हो, वे अपनी सामर्थ्य के अनुरूप अधिक से अधिक योग्य बनें, देश के किसी वर्ग विशेष के नहीं, बल्कि सभी बच्चों को आगे बढ़ने का न्यायसंगत अवसर मिले ताकि पूरे देश की प्रतिभा विकसित होकर देश के विकास का साधन बने, देश के बच्चे देश पर भार नहीं, देश की सम्पदा बनें और इस देश को आगे बढ़ाएं, तो उसका सबसे पहला अनिवार्य उपाय है - शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा/क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग. स्वतंत्र भारत में शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग देश को दो भागों में बाँट रहा है - "इंडिया" और "भारत". महात्मा गाँधी ने जो बात राजभाषा के सन्दर्भ में कही थी, वह शिक्षा के माध्यम के बारे में भी उतनी ही सही है। उनके शब्द थे, ""अगर स्वराज अंग्रेजी बोलने वाले भारतीयों का और उन्हीं के लिए होने वाला है तो निस्संदेह अंग्रेजी ही राजभाषा होगी, लेकिन अगर स्वराज हमारे देश के करोड़ों भूखों मरने वालों, करोड़ों निरक्षरों, पीड़ितों और दलित जनों का भी है और इन सबके लिए होने वाला है तो हमारे देश में हिंदी ही एकमात्र राजभाषा हो सकती है."" शिक्षा के माध्यम के सन्दर्भ में और पूरे देश के सभी बच्चों के सन्दर्भ में बस इसमें "हिंदी" के स्थान पर "भारतीय भाषाएँ" शब्द रख दीजिए. राष्ट्रपिता के इन मर्मभेदी शब्दों के बाद भी क्या किसी और टिप्पणी की आवश्यकता रह जाती है?

पंकज 'वेला'
एम.ए. गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग 
महात्मा गांधी अंतर्राष्तीय हिंदी विश्वविधयालय ,वर्धा 

Questions Paper@ IGNOU BPSC-133 : तुलनात्मक सरकार और राजनीति

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