Wednesday, 5 December 2018

श्रीलाल शुक्ल पर विशेष


सूनी द्घाटी का दैदीप्यमान सूरज :-
हर लेखक की जीवन-शैली ही नहीं, लेखन-शैली भी भिन्न होती है, अपने समकालीनों से भी और पूर्ववर्ती और परवर्ती लेखकों से भी। यही नहीं कई बार एक लेखक की प्रतिभा में दूसरे लेखक की प्रतिभा जोड़ने का जो गुणनफल होता है, साहित्य में उसकी ऊँचाई को ठीक से नापा नहीं जा सकता है। बहुत पहले फणीश्वरनाथ रेणु ने त्रिालोचन पर एक संस्मरण लिखा था, संस्मरण के अंत में लिखते हैं-'त्रिालोचन ;जीद्ध को देखते ही हर बार मेरे मन के ब्लैक बोर्ड पर, एक 'अगणितक', असाहित्यिक तथा अवैज्ञानिक प्रश्न अपने आप लिख जाता हैः 'वह कौन सी चीज है, जिसे त्रिालोचन में जोड़ देने पर वह शमशेर हो जाता है और द्घटा देने पर नागार्जुन?'

यद्यपि रेणु की यह टिप्पणी कवियों के प्रसंग में है लेकिन इससे यह तो पता चलता ही है कि रेणु में अद्भुत काव्य विवेक था। इसी के समकक्ष कभी उपेन्द्र नाथ अश्क ने श्रीलाल जी को अपने एक पत्रा में लिखा था-'पिफर मैंने आपका संग्रह 'अंगद के पाँव' पढ़ा और मैंने अपनी प्रतिक्रिया विस्तार से अपनी पुस्तक 'हिन्दी कहानी : एक अंतरंग परिचय' में दी थी ;जाने आपने देखा या नहींद्ध। मैंने उसमें कहीं लिखा था कि यदि श्रीलाल शुक्ल के पास परसाई की दृष्टि हो और परसाई के पास श्रीलाल शुक्ल का मंजाव हो तो अद्भुत व्यंग्य की सृष्टि हो सकती है।'

यदि गहराई से त्रिालोचन पर रेणु की टिप्पणी और श्रीलाल शुक्ल पर अश्क की टिप्पणी पर विचार करें तो स्पष्ट होगा कि रेणु की टिप्पणी धारदार ही नहीं, सूक्ष्म भी है, जबकि अश्क की टिप्पणी स्थूल ही नहीं, लेखक के व्यक्तित्व को गौण भी करती है। यही नहीं उनकी टिप्पणी का संदर्भ भी अनुपयुक्त है। हम जानते हैं कि परसाई जी ने छोटे उपन्यास और कई छोटी-छोटी लेकिन तीखी कहानियाँ भी लिखी हैं लेकिन मूलतः वे व्यंग्यकार हैं। जबकि श्रीलाल जी मूलतः उपन्यासकार हैं। यह बात अलग है कि वे व्यंग्य लेखक भी हैं। दूसरी बात जो इस संदर्भ में प्रासंगिक है, वो यह है कि यदि श्रीलाल शुक्ल के पास अपनी दृष्टि नहीं होती तो 'राग दरबारी' जैसा कालजयी उपन्यास कभी नहीं लिख पाते। इसी तरह यदि परसाई के लेखन में 'मंजाव' नहीं होता तो वे हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यकार कभी नहीं होते। दोनों लेखक अपने क्षेत्रा में श्रेष्ठ हैं, अपनी लेखकीय दृष्टि और भाषा के मंजाव-कसाव के कारण।

३१ दिसम्बर, १९२५ को उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर के पास के गाँव अतरौली में जन्मे श्रीलाल शुक्ल ने ८३ वर्ष पूरे किए हैं। इलाहाबाद विश्व विद्यालय से स्नातक करने के बाद १९४९ में राज्य सिविल सेवा से सेवानिवृत हुए। १९५४ में प्रकाशित 'स्वर्ण ग्राम और वर्षा' व्यंग्य कथा से रचना यात्राा की शुरूआत की और अब तक कविता छोड़कर साहित्य की अन्य विधाओं में विपुल लेखन किया है। १९७० में 'राग दरबारी ' उपन्यास पर इन्हें साहित्य अकादेमी का पुरस्कार मिला और भारत सरकार द्वारा २००८ में इन्हें पद्मविभूषण से अलंकृत किया गया। इसके अतिरिक्त भी इन्हें अन्य सम्मान और पुरस्कार मिले हैं। विदेश की कई साहित्यिक यात्रााएँ भी इन्होंने की हैं। इस उम्र में भी लेखन में सक्रिय हैं। २००५ में श्रीलाल शुक्ल के अमृत महोत्सव के अवसर पर संगीत में गहरी रुचि और समझ रखने वाले मूर्धन्य हिन्दी कथाकार श्रीलाल शुक्ल की हँसी की जो व्याख्या कथाकार कृष्णबलदेव वैद ने की, उसी को दृष्टि में रखते हुए आलोचक नामवर सिंह ने निराला की पंक्तियों में कहा कि 'ओ हँसी बहुत कुछ कहती थी ;हैद्ध/पिफर भी अपने में रहती थी ।

कृष्णबलदेव वैद ने श्रीलाल शुक्ल की औपन्यासिक हँसी का जिक्र करते हुए कहा था कि 'सबसे ऊँची और असाध्य हँसी गमगीन या काली हँसी है, यह व्यंग्यातीत है। श्रीलाल शुक्ल का शुमार उन बड़े व्यंग्यकारों में है, जिनके काम में व्यंग्य की मौलिक और बौ(कि हँसी को सुना जा सकता है।' अमृत महोत्सव के अवसर पर डॉ. नामवर सिंह के संपादन में 'श्रीलाल शुक्ल : जीवन ही जीवन' पुस्तक लोकार्पित की गई, जिसमें संपादक का पहला लेख 'कस्मै देवाय... का '' से दो प्रसंगों का उल्लेख जरुरी है। पहला-'तय हुआ था कि अस्सी पार का यह ऐतिहासिक जन्मदिवस 'सहस्र चन्द्रोदय' के नाम से मनाया जाए क्योंकि अस्सी वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते मनुष्य एक सहस्र पूर्ण चन्द्र के दर्शन कर लेता है। ज्योतिष की गणना भी यही कहती है। ...श्रीलाल जी को किसी तरह संयोग से इसकी भनक लग गई और उन्होंने तत्काल इसे खारिज कर दिया।

फोन पर मुझे पिफर वही 'हम्बग' की सी गूंज सुनाई पड़ी।' दूसरे प्रसंग का उल्लेख करते हुए नामवर जी लिखते हैं-'श्रीलाल शुक्ल कहानी कहने में जिस 'युक्ति' का प्रयोग करते हैं, उसका गुर दरअसल, उनकी रहस्यपूर्ण अपराध कथा 'आदमी का जहर' में है। एक तरह से यह उपन्यास उनकी कथा-कृतियों में अत्यंत तिरस्कृत है। इस उपन्यास के तिरस्कार में कुछ हाथ स्वयं लेखक का भी है। एक साक्षात्कार में उन्होंने ही अपने श्रीमुख से कहा है कि 'यह सिपर्फ मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई थी। यह 'राग दरबारी' के पहले ,एक अस्थायी आर्थिक कठिनाई के समाधान के लिए अलग-अलग कुल सैंतीस द्घंटों में लिखी गई-लिखी भी नहीं, बोलकर लिखाई गई थी। पर शिल्प की बात जाने दें, ऐसी कृतियाँ कोई सर्जनात्मक चुनौती नहीं देतीं, इसलिए उस अनुभव को दोहराया नहीं।'

हिन्दी में जिन उपन्यासों की चर्चा हुई है, उनमें 'राग दरबारी' ;१९६८द्ध, 'मकान' ;१९७६द्ध, 'पहला पड़ाव' ;१९८७द्ध, और 'विश्रामपुर का संत' ;१९९८द्ध हैं। उपन्यास की तुलना में कहानी संग्रह की संख्या बहुत कम है। व्यंग्य संग्रहों में 'उमराव नगर में कुछ दिन', 'कुछ जमीन पर, कुछ हवा में', 'जहालत के पचास साल' और 'खबरों की जुगाली' चर्चित हुए। श्रीलाल जी ने साहित्य अकादेमी के लिए भगवतीचरण वर्मा और अमृतलाल नागर पर मोनोग्राफ लिखे। आलोचना की इनकी एकमात्रा पुस्तक है-'अज्ञेय : कुछ रंग, कुछ राग' ;१९९९द्ध। 'हिन्दी हास्य व्यंग्य' संकलन का संपादन भी इन्होंने किया है। 'मेरे साक्षात्कार' उनकी अन्य पुस्तक है। 'राग दरबारी', 'पहला पड़ाव' और 'मकान' पुस्तकों का अंग्रेजी एवं सभी प्रमुख्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इसी वर्ष राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली से 'संचयिता : श्रीलाल शुक्ल' प्रकाशित हुई है, जिसमें उनका विशिष्ट लेखन संकलित है।

श्रीलाल शुक्ल हिन्दी के उन थोड़े से शिखर कथाकारों में से हैं जिनकी चिंता के केन्द्र में भारतीय लोकतंत्रा और उसकी विडंबनाओं में फंसा साधारण मनुष्य रहा है। अपने लेखन में उन्होंने हिन्दी प्रदेश के संद्घर्षों, तनावों और अंतर्विरोधों, हताशा, निराशा, जिजीविषा और अंतर्भूत करुणा के सबसे प्रामाणिक और विश्वसनीय वृतांत प्रस्तुत किए हैं। उनकी अंतर्दृष्टि अपने समय और समाज में फैलती-बढ़ती पतनशीलता और विषमता को तीक्ष्णता के साथ देखती है तो दूसरी ओर उसी समाज की मानवीयता और संद्घर्षशीलता को भी ओझल नहीं करती है। श्रीलाल जी की सृजनशीलता का दायरा व्यापक है, जिसमें बुजुर्ग लेखक, समवयस्क और युवतर कथाकारों के प्रति संवेदनशीलता भी है। उनके लेखन की एक बड़ी विशेषता यह है कि वे दूर से दृश्यों को तटस्थ भाव से अपने लेखन से कैप्चर नहीं करते, उसमें खुद इन्वाल्व होते हैं।

श्रीलाल जी अपने लेखन से हिन्दी साहित्य के शीर्ष पर आसानी से नहीं पहुँचे हैं बल्कि हिन्दी के संपादक और आलोचक की भविष्यवाणियों को अपनी औपन्यासिक प्रतिभा से झुठला करके। १९६८ में जब उनका तीसरा उपन्यास 'राग दरबारी' छपा था तो 'कथा' ;संपादक मार्कण्डे यद्ध के सितंबर १९६९ के अंक में श्रीपत राय ने इस पुस्तक की आलोचना करते हुए यह लिखकर इसे रिजेक्ट कर दिया था कि 'यह बहुत बड़ी ऊब का महाग्रंथ' व अतिशय उबाने वाली कुरुचिपूर्ण और कुरचित कृति है'। यही नहीं यह भविष्यवाणी भी की थी कि 'यह अपठित रह जाएगी'। आलोचक नेमिचन्द्र जैन ने इसे 'असंतुष्ट, क्षुब्ध व्यक्ति की बेशुमार शिकायतों और खीज भरे आक्षेपों का अंतहीन सिलसिला' करार दिया था।

'कसौटी' ;संपादक नंदकिशोर नवलद्ध के समापन अंक 'बीसवीं शताब्दी की कालजयी कृतियाँ' में सुवास कुमार ने 'राग दरबारी' का पुनर्मूल्यांकन करते हुए लिखा है-'श्रीपत राय के मंतव्य और भविष्यवाणी को झुठलाते हुए 'गोदान' और 'मैला आंचल' की तरह 'राग दरबारी' भी हिन्दी का 'बेस्ट सेलर' अर्थात बहुपठित और लोकप्रिय उपन्यास साबित हुआ है। आज इसकी पठनीयता को लेकर किसी को शंका करने की गुंजाइश नहीं है। पिछले ४० सालों में इसका खुमार कम हुआ हो, ऐसा नहीं लगता। उलटे, इस बीच इसने 'क्लैसिक' का दर्जा पा लिया है।' समकालीन हिन्दी आलोचना में जिस तरह आलोचकों या संपादकों के प्रयत्न से अनेक कृतियाँ जिस तरह उछाली जाती हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं, जहां आलोचक चाह कर भी कृतियों को दबाये रखने में सफल नहीं हुए हैं।

उदाहरण के लिए नंददुलारे वाजपेयी जैसे आलोचक 'गोदान' के स्थापत्य से नाखुश थे। डॉ. रामविलास शर्मा ने 'मैला आंचल' की प्रतिकूल समीक्षा लिखी। डॉ. नामवर सिंह 'मैला आंचल' के महत्व को सही वक्त पर नहीं पहचान सके लेकिन इससे इन पुस्तकों का महत्व कम नहीं हुआ। एक आलोचक ने सही टिप्पणी की है-'मैला आंचल' का गाँव 'गोदान' के गाँव से, समय के लिहाज से लगभग एक दशक की दूरी पर है तो 'राग दरबारी' का गाँव 'मैला आंचल' के गाँव से कोई दो दशकों की दूरी पर। गाँवों में होने वाले परिवर्तनों और परिवर्तनों की तह में छिपी हुई प्राणधारा को पकड़ने की रेणु और शुक्ल ने अपने-अपने ढंग से ईमानदार कोशिश की है। 'गोदान' और 'मैला आंचल' की भांति ही 'राग दरबारी' की रचना की अपनी मौलिकता और अपना औचित्य है।

वैसे तो श्रीलाल शुक्ल के 'मकान' में कुछ दिन राजेश जोशी भी रह चुके हैं। किरायेदार के रूप में नहीं, एक पाठक के रुप में लेकिन 'पंडित श्रीलाल शुक्ल' से जिस तरह रवीन्द्र कालिया की अंतरंगता है, उस तरह नहीं। अपने संस्मरण में कालिया जी लिखते हैं-'मैं हिन्दी के उन खुशनसीब लेखकों में हूँ, जिसने श्रीलाल जी के साथ जमकर दारु पी है, डाँट खाई है और उससे कहीं ज्यादा स्नेह पाया है।'

हिन्दी में कुछ ही ऐसे साहित्यकार हैं जिनके जीवन और लेखन में संतुलन है, श्रीलाल जी उन्हीं में एक हैं। 'सूनी द्घाटी का यह सूरज' हिन्दी साहित्य के आकाश में सदियों तक दैदीप्यमान रहे, यही हमारी शुभकामना है। 

मूल लेखिका:- साधना अग्रवाल




पंकज वेला दशकंठी
एम.ए. गांधी एवं शांति अध्ययन
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
मैं मात्र प्रस्तुतकर्ता

भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति....







संस्कृति किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र रूप का नाम है जो उस समाज के सोचने, विचारने, कार्य करने, खाने-पीने, बोलने, नृत्य, गायन, साहित्य, कला, वास्तु आदि में परिलक्षित होती है। संस्कृति का वर्तमान रूप किसी समाज के दीर्घ काल तक अपनायी गयी पद्धतियों का परिणाम होता है। मनुष्य स्वभावतः प्रगतिशील प्राणी है। यह बुद्धि के प्रयोग से अपने चारों ओर की प्राकृतिक परिस्थिति को निरन्तर सुधारता और उन्नत करता रहता है। सभ्यता से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है जबकि संस्कृति से मानसिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है।

मैं बचपन से दो प्रकार की संस्कृतियों के बारे में सुनती आ रही हूँ। भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति या अंग्रेजी संस्कृति । हमारे भारत देश की संस्कृति को भारतीय अथवा पूर्वी संस्कृति के नाम से जाना जाता है और यूरोप, अमरीका आदि देशों की संस्कृति को पाश्चात्य अथवा पश्चिमी संस्कृति के नाम से जाना जाता है। पाश्चात्य अथवा पश्चिमी संस्कृति को हमेशा से बुरा बोला।

मैं भारतीय संस्कृति में पली-बढ़ी हूँ। इसलिए मेरी समस्त क्रियाएँ और व्यवहार भारतीय संस्कृति का पर्याय है।

अभी कुछ दिनों के लिए मैंने यूरोपीय यात्रा की। 10 दिन मैंने जर्मनी और पेरिस में बिताए। मैंने हमेशा से सुना है कि पूर्वी संस्कृति हमारी भारतीय संस्कृति कहलाती है जिसमें सदाचार, त्याग, संयम, धर्म, सामाजिक परंपराएँ, रीति-रिवाज़ आदि हैं। आज तक जब भी भारतीय संस्कृति में कुछ भी संस्कृति के प्रति अपवाद रहा है तो पाश्चात्य संस्कृति को ही दोष दिया जाता रहा है। परंतु आज जब मैंने खुद भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति दोनों का अनुभव लिया तो यही अहसास किया कि ये एकदम गलत है कि भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति का दुष्प्रभाव है। मैंने कुछ महत्वपूर्ण तथ्य निकाले हैं जिनमें देखा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति का कोई भी दुष्प्रभाव व्यक्त नहीं होता है। पाश्चात्य संस्कृति के सभी सकारात्मक पहलू हैं। अगर उन्हें अपनाया जाए तो हमारा भारत देश और उसकी भारतीय संस्कृति भी काफी विकसित होगी। पाश्चात्य संस्कृति के विरुद्ध सोच रखने वाले लोगों को ये सकारात्मक पहलुओं से दृष्टिपात कराना बहुत आवश्यक है:

1. पहनावा - सबसे पहले अगर हम पहनावे की बात करें तो जहाँ भारतीय संस्कृति का पहनावा सूट, साड़ी, कुर्ता-पाजामा आदि है तो वहीं पाश्चात्य संस्कृति का पहनावा पैंट-शर्ट, स्कर्ट-टॉप आदि है। मैंने हमेशा देखा है कि जब अंग्रेज़ लोग भारत में आते हैं तो यहाँ के पहनावे की ओर आकर्षित होते हैं। तो स्वभावतः जब कोई भारतीय विदेश जाता है तो वह भी वहाँ के पहनावे की ओर आकर्षित होता है लेकिन साथ-ही-साथ उस पहनावे को अपना लेता है। तो इसमें गलती किसकी है??? यकीनन इसमें गलती उस भारतीय की है जो अपने पहनावे को छोड़कर दूसरे देश के पहनावे को अपना रहा है। ये उस व्यक्ति के ऊपर निर्भर करता है जो अपने पहनावे को छोड़कर दूसरे देश के पहनावे को अपना रहा है। इसमें कहीं भी पाश्चात्य संस्कृति का कोई दोष नहीं है।

2. भाषा - आज अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी संस्कृति के रंग में रंगने को ही आधुनिकता का पर्याय समझा जाने लगा है। प्रत्येक सरकारी कार्यालय में हिंदी और अंग्रेजी द्विभाषी रूप में काम करना आवश्यक है लेकिन आज भी कई सरकारी कार्यालय हैं जिनमें अंग्रेजी में ही कार्य किया जाता है, मीटिंग की जाती हैं और सम्प्रेषण भी अंग्रेजी में किया जाता है। जब हमारे भारत देश की आधारिक भाषा हिंदी है तो क्यों उसे अपनाने में लोग कतराते हैं।

3. सामाजिक-स्थिति - एक समय था जब हमारे युवाओं के आदर्श, सिद्धांत, विचार, चिंतन और व्यवहार सब कुछ भारतीय संस्कृति के रंग में रंगे हुए होते थे। वे स्वयं ही अपने संस्कृति के संरक्षक थे, परंतु आज उपभोक्तावादी पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध से भ्रमित युवा वर्ग को भारतीय संस्कृति के अनुगमन में पिछड़ेपन का एहसास होने लगा है। जिस युवा पीढ़ी के उपर देश के भविष्य की जिम्मेदारी है , जिसकी उर्जा से रचनात्मक कार्य सृजन होना चाहिए, उसकी पसंद में नकारात्मक दृष्टिकोण हावी हो चुका है। संगीत हो या सौंदर्य, प्रेरणास्त्रोत की बात हो या राजनीति का क्षेत्र या फिर स्टेटस सिंबल की पहचान सभी क्षेत्रों में युवाओं की पाश्चात्य संस्कृति में ढली नकारात्मक सोच स्पष्ट परिलछित होने लगी है। आज महानगरों की सड़कों पर तेज दौड़ती कारों का सर्वेक्षण करे तो पता लगेगा कि हर दूसरी कार में तेज धुनों पर जो संगीत बज रहा है वो पॉप संगीत है। युवा वर्ग के लिए ऐसी धुन बजाना दुनिया के साथ चलने की निशानी बन गया है। युवा वर्ग के अनुसार जिंदगी में तेजी लानी हो या कुछ ठीक करना हो तो गो इन स्पीड एवं पॉप संगीत सुनना तेजी लाने में सहायक है।

हमें सांस्कृतिक विरासत में मिले शास्त्रीय संगीत व लोक संगीत के स्थान पर युवा पीढ़ी ने पॉप संगीत को स्थापित करने का फैसला कर लिया है।

आज विदेशी संगीत चैनल युवाओं की पहली पसंद बनी हुई है। इन संगीत चैनलों के ज्यादा श्रोता 15 से 34 वर्ष के युवा वर्ग हैं। आज युवा वर्ग इन चैनलों को देखकर अपने आप को मॉडर्न और ऊँचे ख्यालों वाला समझ कर इठला रहा है। इससे ये एहसास हो रहा है कि आज के युवा कितने भ्रमित हैं अपने संस्कृति को लेकर और उनका झुकाव पाश्चात्य संस्कृति की ओर ज्यादा है। ये भारतीय संस्कृति के लिए बहुत दुख: की बात है।

आज युवाओं के लिए सौंदर्य का मापदण्ड ही बदल गया है। विश्व में आज सौंदर्य प्रतियोगिता कराई जा रही है, जिससे सौंदर्य अब व्यवासाय बन गया है। आज लड़कियाँ सुन्दर दिख कर लाभ कमाने की अपेक्षा लिए ऐन -केन प्रकरण कर रही है। जो दया, क्षमा, ममता ,त्याग की मूर्ति कहलाती थी उनकी परिभाषा ही बदल गई है। आज लड़कियां ऐसे ऐसे पहनावा पहन रही हैं जो हमारे यहाँ अनुचित माना जाता है। आज युवा वर्ग अपने को पाश्चात्य संस्कृति मे ढालने मात्र को ही अपना विकास समझते हैं। आज युवाओं के आतंरिक मूल्य और सिद्धांत भी बदल गये हैं। आज उनका उददेश्य मात्र पैसा कमाना है। उनकी नजर में सफलता की एक ही मात्र परिभाषा है और वो है दौलत और शोहरत । चाहे वो किसी भी क्षेत्र में हो । इसके लिए वो कुछ भी करने को तैयार हैं।

संपन्नता दिखाकर हावी हो जाने का ये प्रचलन युवाओं को सबसे अलग एवं श्रेष्ठ दिखाने की चाहत के प्रतीक लगते हैं।

4. संस्कृति - वस्तुत: हम भारतीय अपनी परम्परा, संस्कृति , ज्ञान और यहाँ तक कि महान विभूतियों को तब तक खास तवज्जो नहीं देते जब तक विदेशों में उसे न स्वीकार किया जाये। यही कारण है कि आज यूरोपीय राष्ट्रों और अमेरिका में योग, आयुर्वेद, शाकाहार , प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, होम्योपैथी और सिद्धा जैसे उपचार लोकप्रियता पा रहे हैं जबकि हम उन्हें बिसरा चुके हैं। हमें अपनी जड़ी-बूटियों, नीम, हल्दी और गोमूत्र का ख्याल तब आता है जब अमेरिका उन्हें पेटेंट करवा लेता है। योग को हमने उपेक्षित करके छोड़ दिया पर जब वही योगाबनकर आया तो हम उसके दीवाने बने बैठे हैं।

पाश्चात्य संस्कृति में पले-बसे लोग भारत आकर संस्कार और मंत्रोच्चार के बीच विवाह के बन्धन में बँधना पसन्द कर रहे हैं और हमें अपने ही संस्कार दकियानूसी और बकवास लगते हैं।

5. बोलचाल - हमारे देश में प्रत्येक राज्य की अपनी भाषा है। भाषाओं की विभिन्नता के समावेश के बावजूद भी अंग्रेजी को बोलचाल का माध्यम बनाया जाता है। मुझे समझ नहीं आता कि जितनी मेहनत हम लोग अंग्रेजी सीखने में करते हैं उतनी मेहनत करके हम अपने ही भारत देश की किसी और भाषा को सीखने में क्यों नहीं करते हैं? पाश्चात्य अथवा अंग्रेजी संस्कृति को दोष देने से पहले प्रत्येक भारतीय को अपने गिरेबॉन में झाँक कर देखना चाहिए कि वो खुद अपनी संस्कृति के प्रति कितना निष्ठावान है।

6. सफाई - सीधी सच्ची बात है कि जब तक हमारे घर, द्वार और रास्ते गन्दे रहेंगे, हमारी आदतें गन्दी रहेंगी तब तक हम अपने आपको सभ्य और सुसंस्कृत नहीं कह सकते । आज पूरा भारत और भारतीय समाज गन्दगी का अखाड़ा बन गया है, इस बात से न हम इन्कार कर सकते हैं न आप । विदेशों में सफाई के प्रति लोगों में जागरूकता आ चुकी है। जैसे भारत में बच्चों को बचपन से बड़ों के पैर छूना, नमस्ते करना सिखाया जाता है उसी तरह अमेरिका में बच्चों को कचरे को डस्टबिन में फेंकना सिखाया जाता है। जहां डस्टबिन नहीं होता वहां बच्चे कचरे को अपने बैग में रख लेते हैं। हमें भी कुछ ऐसी ही पहल कर अपनी कॉलोनी और शहर को स्वच्छ रख सकते हैं।

7. महंगाई - भारत में आज लोगों को मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसना पड़ रहा है; जैसे- रहने के लिए घर नहीं हैं, पीने के लिए साफ़ पानी नहीं है, खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता पर विश्वास नहीं किया जा सकता, बिजली जो आती कम है जाती ज्यादा है, बढ़ती मंहगाई ने सबको तंग किया हुआ है। मंहगाई इन सारी समस्याओं पर ज्यादा भारी पड़ती है। क्योंकि यदि मंहगाई बढ़ती है तो वह इन सभी पर सीधे असर डालती है। सरकार चाहे इसका कोई भी कारण दे परन्तु आम आदमी इस मंहगाई से त्रस्त है। मंहगाई उनके जीवन को खोखला बना रही है। महंगाई हर जगह अपना मुँह फाड़े खड़ी है। फिर वह कैसी भी क्यों न हों। भारत की स्थिति अब इस उक्ति पर फिट बैठती है - "आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया" । जबकि विदेशों में महंगाई से लोग त्रस्त नहीं हैं। जर्मनी में अगर किसी के पास एक यूरो भी हो तो वह उससे कुछ खरीद कर खा सकता है, उसको भूखा नहीं मरना पड़ेगा। वहाँ पर मेहनत-मजदूरी करके रहा जा सकता है।

8. टी.वी. चैनल - भारत में टी.वी. चैनलों की भरमार है। पहले सिर्फ हिन्दी में ही चैनलों का प्रसारण होता था और चैनल भी दो ही थे। लेकिन धीरे-धीरे चैनलों के साथ-साथ भाषाएँ भी बढ़ती गईं। आज हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं में भी चैनलों का प्रसारण हो रहा है जो एक अच्छी बात है। लेकिन भारतीय चैनल अंग्रेजी को अब भी अपनाकर चल रहे हैं। विदेशों में उनकी स्थानीय भाषा में ही चैनलों का प्रसारण होता है। वहाँ मुश्किल से एक या दो चैनल ही अंग्रेजी में प्रसारित होते हैं। वहाँ अपनी स्थानीय भाषा को महत्व दिया जाता है। इसी तरह भारतीय परिवेश में भी स्थानीय भाषा का वर्चस्व होना चाहिए।

9. व्यवस्था-प्रणाली - भारत में कुछ भी व्यवस्थित रूप से नहीं है। चाहे वो बस की लाईन हो, दुकान में खरीददारी की लाईन हो, या कहीं कालेज में प्रवेश लेने की लाईन हो - हर जगह धक्का-मुक्की लगी रहती है। सड़क पर ना वाहन चलाने का व्यवस्थित तरीका है और ना ही पैदल चलने वालों को सड़क पर चलने का तरीका आता है। सड़कों पर ध्वनि प्रदूषण की मारा-मारी है। लोग एक-दूसरे से टकरा कर चलने में अपनी शान समझते हैं। लड़कियों को छेड़ने के तो मामले आम हो गए हैं। भारत में लड़कियाँ कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। भ्रष्टाचार हर जगह अपने पैर पसारे हुए हैं।

विदेशों में हर जगह सुव्यवस्था समाई हुई है। वहाँ कोई भी किसी के व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता। हर काम सुचारू रूप से समय पर होता है। अंग्रेज समय के बहुत पाबंद होते हैं। हर काम व्यवस्थित ढंग से होने पर विदेश और विदेश के लोग तरक्की करते जा रहे हैं।

10. राजनीति - भारतीय राजनीति अकंठ भ्रष्टाचार में डूब चुकी है, देश आर्थिक गुलामी की ओर अग्रसर है, ऐसे में भ्रष्टाचार और कुशासन से लोहा लेने के बजाय समझौतावादी दृष्टिकोण युवाओं का सिद्धांत बन गया है। उनके भोग विलास पूर्ण जीवन में मूल्यों और संघर्षो के लिए कहीं कोई स्थान नहीं है।

11. प्रचार-प्रसार माध्यम - आज भारत में हर प्रचार माध्यम के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता के स्थान पर पश्चिमी मानदंडों के अनुसार प्रतिद्धंद्धी को मिटाने की होड़ लगी हुई है। सनसनीखेज पत्रकारिता के माध्यम से आज पत्र- पत्रिकाएं, ऐसी समाजिक विसंगतियो की घटनाओं की खबरों से भरी होती हैं जिसको पढ़कर युवाओं की उत्सुकता उसके बारे में और जानने की बढ़ जाती है। युवा गलत तरह से प्रसारित हो रहे विज्ञापनों से इतने प्रभावित हो रहे है कि उनका अनुकरण करने में जरा भी संकोच नहीं कर रहें है।

हम भले ही गाँधी की के आदर्शों को तिलांजलि दे रहे हैं पर अमेरिका में पिछले कुछ वर्षों में करीब पचास विश्वविद्यालयों और कॉलेजों ने गाँधीवाद पर कोर्स आरम्भ किये हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्ट वर्जीनिया, यूनिवर्सिटी ऑफ हवाई, जॉर्ज मेरून यूनिवर्सिटी के अलावा और भी कई विश्वविद्यालयों ने अपने यहाँ गाँधीवाद विशेषकर गाँधी जी की अहिंसा और पड़ोसियों विरोधाभास ही लगता है कि हम भारतीय आत्मगौरव और राष्ट्रीय स्वाभिमान की अनदेखी करते हुए अपनी संस्कृति और उसकी समृद्ध विरासत को नक्कारने का प्रयास कर रहे हैं।

हम पाश्चात्य देशों या विदेशों या अंग्रेजों की आलोचना उनके स्वछंद व्यव्हार को देखते हुए करते हैं परन्तु उनके विशेष गुणों जैसे देश-प्रेम, ईमानदारी, परिश्रम, कर्मठता को भूल जाते हैं। जिसके कारण आज वे विश्व के विकसित देश बने हुए हैं। सिर्फ उनके खुलेपन के व्यवहार के कारण उनकी अच्छाइयों की उपेक्षा करना और उनका विरोध करना कितना तर्कसंगत है?

परिवर्तन प्रकृति का नियम है, लेकिन ये परिवर्तन हमें पतन के ओर ले जायेगा । युवाओं को ऐसा करने से रोकना चाहिए नहीं जिस संस्कृति के बल पर हम गर्व महसूस करते है, पूरा विश्व आज भारतीय संस्कृति की ओर उन्मूख है लेकिन युवाओं की दीवानगी चिन्ता का विषय बनी हुई है। हमारे परिवर्तन का मतलब सकारात्मक होना चाहिए जो हमें अच्छाई से अच्छाई की ओर ले जाए । युवाओं की कुन्ठित मानसिकता को जल्द बदलना होगा और अपनी संस्कृति की रक्षा करनी होगी । आज युवा ही अपनी संस्कृति के दुश्मन बने हुए हैं। अगर भारतीय संस्कृति न रही तो हम अपना अस्तित्व ही खो देगें। संस्कृति के बिना समाज में अनेक विसंगतियॉं फैलने लगेगी, जिसे रोकना अतिआवश्यक है। युवाओं को अपने संस्कृति का महत्व समझना चाहिये और उसकी रक्षा करनी चाहिए । भारतीय संस्कृति को सुदृढ़ और प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित बातों को अपनाना चाहिए :

(1) भारत को विज्ञान-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्रिम पंक्ति में आना पड़ेगा। और यह भी आवश्यक है कि उसकी गड़मड़ संस्कृति के स्थान पर एक समेकित भारतीय संस्कृति जीवन्त रूप में आए।
(2) प्रदेशों की अपनी भाषाओं में ही मुख्य शिक्षा हो तथा प्रदेशों का राजकाज भी। प्रमुख भारतीय भाषाओं में यह शक्ति है।
(3) अंग्रेजी की शिक्षा उतनी ही दी जाए जितनी एक विदेशी भाषा की उपयोगिता को देखते हुए आवश्यक है। अंग्रेजी को रोजी-रोटी के लिए कतई आवश्यक न बनाया जाए।
(4) अंग्रेजी का स्थान हिन्दी को नहीं लेना है ।
(5) मात्र उतनी ही हिन्दी की शिक्षा दी जाए जितने में सारे प्रदेशों का परस्पर संपर्क सध सके। हिन्दी को रोजी-रोटी के लिए आवश्यक न बनाया जाये। हिन्दी भाषियों को एक अन्य भारतीय भाषा में इतनी ही योग्यता प्राप्त करना अनिवार्य बनाया जाये जो उनके वैकल्पिक कार्य क्षेत्र के लिए उपयुक्त हो।
(6) एक सशक्त अनुवाद-सेना तैयार की जाए।
(7) सांस्कृतिक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाए ताकि भ्रष्टता का उन्मूलन किया जा सके।
(8) जब संविधान में हिन्दी को राष्ट्रभाषा तथा सम्पर्क भाषा बनाने का आदेश है¸ तथा क्षेत्रीय भाषाओं को अपने क्षेत्रों में राजकाज करने का आदेश है¸ और हिन्दी तथा क्षेत्रीय भाषाओं में अपना कार्य करने की पूरी क्षमता है¸ तब यह षड्यन्त्र नहीं तो क्या है जो इन भाषाओं को उचित स्थान नहीं देने देता? यह स्थिति बहुत दुखदायक है क्योंकि उदात्त या मानवीय संस्कृति ही जीवन सुखी बना सकती है।

          उपरोक्त ध्येय नितान्त वांछनीय हैं और यह हमारे आदान-प्रदान के सौहार्द पर¸ त्याग की भावना पर¸ आपसी प्रेम की भावना पर तथा मुख्यत: अपने देश-प्रेम पर निर्भर करता है। प्रेम इस विषय में सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है। हमारे राष्ट्र में मूलभूत रूप से सांस्कृतिक एकता है। हमारी मूल संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम्वाली संस्कृति है जिसका अस्तित्व सारे भारत में है। हमारे साहित्य में एकता है¸ एकरूपता नहीं¸ एकात्मता है। हम संकीर्ण राजनैतिक स्वार्थो के ऊपर उठ सकते हैं। हमारी भाषाओं में अधुनातम विज्ञान-प्रौद्योगिकी को अभिव्यक्त करने की शक्ति है। भारत में न केवल विश्व-शक्ति बनने की क्षमता है वरन विश्व को भोगवाद के राक्षस से बचाने की भी क्षमता है।

आलेख के मूल लेखक:-

डॉ. काजल बाजपेयी
संगणकीय भाषावैज्ञानिक
सी-डैक, पुणे

आलेख तिथि :- 25/07/2014  

पंकज वेला दशकंठी
एम.ए. गांधी एवं शांति अध्ययन
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालयवर्धा


प्रस्तुतकर्ता मात्र मैं 

Tuesday, 20 November 2018

कॉपीराइट एक्ट की विशेषताएँ


किसी भी सृजनात्मक कार्य का कर्ता यानि कलाकार का सृजन का मुख्य उदेश्य मूलतः तीन ही होते हैं : स्वांतः सुखाय अर्थात आनंद, यशोपार्जन या फिर अर्थोपार्जन। कलाकार को आनंद तो सृजन के क्षणों मे मिल जाता है लेकिन अगर बाद में उसकी कृति चोरी हो जाए या अन्य व्यक्ति दावा करने लगे तो उसका यश लाभ और अर्थोपार्जन बाधित हो जाता है। कोई भी कृति कलाकार के मानस की उपज होती है। उसे भौतिक रूपकार प्रदान करने में लंबे समय तक शारीरिक और मानसिक श्रम की आवश्यकता होती है। इस प्रकार कृति कलाकार द्वारा अर्जित सम्पदा होती है। वास्तव में कृति का मूलाधार कलाकार की बौद्धतिकता होती है इसलिए उसे बौद्धिक संपदा कहा जाता है। बौद्धिक सम्पदा पर अधिकार और संगत लाभ से अगर रचनाकार वंचित हो जाए तो उसके के मौलिक अधिकारों का हनन होता है और यह स्थिति मानहानिकारक भी होती है। अगर कोई किसी के अधिकारों का हनन करे या फिर मानहानि करे तो यह कृत्य अपराध होता है।
पुराने समय में बौद्धिक सम्पदा से जुड़े अपराध जटिल नहीं होते थे। प्रिंटिग प्रेस के आविष्कार नें पुस्तकों की हजारों लाखों प्रतियाँ छपना संभव बना दिया। इसलिए एक ऐसे कानून की आवश्यकता महसूस की गई जो प्रतिलिपि का अधिकार सुनिश्चित करता हो। फलतः कॉपीराइट एक्ट बना।
कॉपीराइट एक्ट या प्रतिलिपि अधिकार अधिनियम, 1847 भारत का इस विषय पर पहला कानून था जो 1911 तक बना रहा। इसके बाद इंगलिश कॉपीराइट एक्ट 1911 भारत में 31 अक्तूबर, 1912 से लागू किया गया। 1914 में भारतीय विधानमंडल ने इंग्लिश कॉपीराइट एक्ट, 1911 के प्रावधानों को सम्मिलित करके भारतीय कॉपीराइट अधिनियम, 1914 लागू किया। जब इंग्लिश एक्ट, 1911 को इंग्लिश कॉपीराइट एक्ट, 1956 द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया तो भारतीय अधिनियम को बदलना आवश्यक हो गया। इसलिए आज का कॉपीराइट एक्ट, 1957 में बना जो पूरी तरह से भारतीय है।
कॉपीराइट एक्ट, 1957 में अब तक पाँच बार (1983,1984,1992,1994और 1999 ) संशोधन किया गया है। वर्तमान कॉपीराइट एक्ट, 1999 में संशोधित होकर 15 जनवरी 2000 से लागू है।
वर्तमान कॉपीराइट एक्ट एक व्यापक कानून है। इस अधिनियम के अनुसारशब्‍द 'कॉपीराइटका अर्थ है कोई कार्य को करने या उसका पर्याप्‍त भाग करने या प्राधिकृत करने का एकमात्र अधिकार। इसके अंतर्गत,
  • ·        साहित्यिक रचना
  • ·        नाट्य रचना
  • ·        संगीत रचना
  • ·        कलात्मक रचना
  • ·        चलचित्र रचना
  • ·        ध्वनि रिकार्डिंग
  • ·        कम्प्युटर से जुड़ी रचनाएँ जैसे सारणी, डाटाबेस आदि

के स्त्वाधिकार, संबन्धित अपराध और दंड के लिए नियम निर्धारित किए गए हैं। मोटे तौर पर यह इस अधिनियम की विशेषता मानी जा सकती है। लेकिन इस अधिनियम की विशेषताओं को थोड़े गहराई से समझने के लिए इसके प्रावधानों की जानकारी आवश्यक है।
कॉपीराइट एक्ट के प्रावधानों के अध्ययन के बाद जो विशेषताएँ परिलक्षित होती है वे निम्नलिखित हैं :
·        प्रतिलिपि अधिकार रजिस्ट्रार के अधीन एक प्रतिलिपि अधिकार कार्यालय खोला जाएगा जो केंद्र सरकार के निरीक्षण में उसके निर्देशानुसार कार्य करेगा। इस कार्यालय का मुख्य कार्य एक प्रतिलिपि अधिकार रजिस्टर को बनाए रखना होगा जिसमें लेखकों की इच्छा पर उनके नाम, पते, उनके प्रतिलिपि अधिकार तथा अन्य जानकारियाँ लिखी होंगी। यह रजिस्टर आम जनता की जानकारी की लिए उपलब्ध रहेगा। प्रतिलिपि अधिकार के रजिस्ट्रेशन को बढ़ावा देने के लिए यह आवश्यक बनाया गया है।
·        यदि किसी को प्रतिलिपि अधिकार के उलंघन का मुकदमा या कोई कानूनी प्रक्रिया करनी हो तो यह तब तक नहीं होगा जबतक उसकी कृति प्रतिलिपि अधिकार कार्यालय में रजिस्टर्ड नहीं होगी।  
·        प्रतिलिपि रजिस्ट्रार का यह कर्तव्य होगा कि वह आवश्यक लाइसेन्स के आवेदनों को सुने एवं उसका निबटारा करे तथा ऐसी शिकायतों कि जांच-पड़ताल करे जो प्रतिलिपि अधिकार के उलंघन  से संबन्धित हो। इस अधिनियम में प्रतिलिपि अधिकार रजिस्ट्रार के विरूद्ध प्रतिलिपि अधिकार बोर्ड में अपील का भी प्रावधान है।
·        यह अधिनियम प्रतिलिपि अधिकार बोर्ड को यह अधिकार देता है कि वह किसी प्रदर्शन करनेवाले कलाकार या सोसाइटी की फीस की दर, खर्चे या रायल्टी तय करेगा, किसी कीर्ति को आम लोगों में प्रदर्शित करने के लाइसेंसों के आवेदन पर गौर करेगा और कुछ खास परिस्थितियों में मुआवजे तय करेगा। प्रतिलिपि अधिकार बोर्ड के आदेश के खिलाफ अपील उच्चन्यायालय में की जा सकेगी।
·        प्रतिलिपि अधिकार शब्द की व्याख्या का विस्तार करते हुए इस अधिनियम में रेडियो डिफ़्यूजन द्वारा संचार करने का एकाधिकार भी शामिल किया गया है।
·        एक सिनेमैटोग्राफ फिल्म का उसकी कहानी, संगीत आदि के प्रतिलिपि अधिकार से स्वतंत्र अपना अलग प्रतिलिपि अधिकार होगा।
·        यदि कोई लेखक अपनी रचना का प्रतिलिपि अधिकार किसी को दे देता है तो इस अधिनियम के तहत उसे पुनः वापस पा सकता है बशर्ते प्रतिलिपि अधिकार कि तारीख से सात वर्ष बीत चुके हों लेकिन यह दस वर्ष से पहले हो और उसे करारनामे के समय ली गई राशि को सूद सहित वापस करना होगा।
·        सामान्य स्थिति में प्रतिलिपि अधिकार कि स्थिति लेखक के जीवनपर्यंत और मरने के बाद पचास वर्ष बाद तक है जबकि अंजान और दूसरे नाम से प्रकाशित लेखकों के लिए यह अवधि कम है।
·        वर्तमान अधिनियम में, भारत छपी कृति अगर दस वर्ष से पहले अनूदित हो गई हो तो उसके अनुवाद का अधिकार दस वर्ष बाद खत्म हो जाता है।
·        किसी भी एलेक्ट्रोनिकल या मेकेनिकल माध्यम से किसी कृति के जनमंचन के लिए आम या खास लाइसेन्स का प्रावधान है।
·        पुस्तकालयों को यह अधिकार दिया गया है कि अगर प्रतिलिपि अधिकार प्राप्त पुस्तक की अन्य प्रति उपलब्ध नहीं हो तो वह उसकी एक कॉपी करावा सकता है।
·        जनमंचन करनेवाली संस्थाओं की गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए, उनके द्वारा फीस , खर्चे एवं रायल्टी लेने पर प्रावधान बनाए गए हैं।
·        प्रतिलिपि अधिकार से मिलते-जुलते कुछ अधिकार ब्रॉडकास्टिंग अधिकारियों को भी दिया गया है।
·        किसी कृति का रेडियो या न्यायिक प्रक्रिया द्वारा उचित प्रयोग प्रतिलिपि अधिकार का उलंघन नहीं है।
·        अंतरराष्ट्रीय कॉपीराइट संबंध जो अंतरराष्ट्रीय संधियों पर आधारित है उनको केंद्र सरकार द्वारा इन विषयों पर प्रदत आदेशों के अनुसार नियंत्रित किया जाएगा।



संदर्भ :
1.  कक्षा व्याख्यान – सतीश उपाध्याय।
2.  कॉपीराइट – कमलेश जैन।
3.  इंटरनेट (ब्लॉग, कानूनी पहल)।

अंतर अनुशासनिक अध्ययन का तात्पर्य और अवधारणा


अंतर अनुशासनिक अध्ययन का तात्पर्य वैसे अध्ययन से है जिसमें विद्या के एक से अधिक शाखाओं का पारस्परिक प्रभाव और सम्बद्ध विद्या शाखा के नियमों एवं सिद्धान्त के आधार पर इस प्रभाव की पहचान की जाती है।  इसे समझने के लिए साहित्य और प्रदर्शनकारी कला ज्यादा उपयुक्त होते हैं जिसमें सभी विषयों और कलाओं का समाहार हो जाता है। इसलिए स्वाभाविक है की इन विषयों का अध्ययन इनके मूल सिद्धांतों के अतिरिक्त अन्य विषयों के कोणों से करना अपेक्षित हो जाता है।
अंतर अनुशासनिक अध्ययन अंग्रेजी भाषा के इंटरडिसिप्लिनरी स्टडि का हिन्दी पर्याय है। विद्वानों ने डिसिप्लिन शब्द का सटीक हिन्दी पर्याय विद्या शब्द होने के चलते इंटरडिसिप्लिनरी स्टडि का हिन्दी पर्याय अंतरविद्यावर्ती अध्ययन माना है। डॉ॰ फादर कामिल बुल्के ने  भी अपने अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश में डिसिप्लिन के लिए विद्या शब्द ही दिया है।[1] लेकिन अंतर अनुशासनिक अध्ययन हीइंटरडिसिप्लिनरी स्टडि का हिन्दी पर्याय रूप में चल पड़ा।
अंतर अनुशासनिक अध्ययन के संदर्भ में क्लीन और नेवेल नामक विद्वान का कहना है, “अंतर अनुशासनिक अध्ययन प्रश्नो के उत्तर देने की प्रक्रिया है, समस्या समाधान की एक प्रणाली या बहुत विस्तृत या जटिल विषय को संबोधित करने की शैली है जो एक अनुशासन के द्वारा पूर्ण रूप में संबोधित नहीं हो पाते तथा साथ ही यह अनुशासनों से प्राप्त परिप्रेक्ष्यों और अंतर्दृष्टियों को समन्वित कर व्यापक परिप्रेक्ष्य की रचना करता है ”
विलियम नेवेल का कहना है, अंतर अनुशासनिक अध्ययन दो भागों की वैसी प्रक्रिया है जिसमें पहला, बहुत क्षीण रूप में दूसरे अनुशासनों से अंतर्दृष्टि प्राप्त किया जाता है और दूसरा किसी जटिल प्रघटना की वृहद समझ के लिए उपस्थित अनुशासनों की अंतर्दृष्टियों का समन्वय किया जाता है”।   
वेरोनिका बोइक्स मेनसीला जर्नल में कहा गया है, “अंतर अनुशासनिक अध्ययन ज्ञान को समन्वित करने और सोचने की वैसी पद्धति है जिन्हें दो या दो से अधिक अनुशासनों से प्राप्त किए गए हों, जिनका उद्येश्य होता है संज्ञानात्मक प्रगति को प्राप्त करना। उदाहरण के लिए किसी घटना का वर्णन, समस्या का समाधान, किसी वस्तु का निर्माण या नए प्रश्नो को उठाना जिसे किसी एक विषय के माध्यम से नहीं प्राप्त किया जा सकता है ”।
द नेशनल एकैडमी ऑफ साइन्स, इंजीन्यरिंग एण्ड मेडिसीन से प्रकाशित रिसर्च जर्नल में कहा गया है, “ अंतर अनुशासनिक शोध, किसी शोध दल या व्यक्तिगत स्तर पर किए जानेवाले शोध की वह पद्धति है जिसमें दो या दो से अधिक अनुशासनों या किसी विशेष ज्ञान के भागों या अंशों के आधारभूत समझ को विकसित करने के लिए या समस्याओं के समाधान के लिए जिनका समाधान किसी एक अनुशासन के शोध अभ्यास से परे है, से संबन्धित सूचनाओं, आकड़ों,तकनीकों, उपकरणों, परिप्रेक्ष्यों, अवधारणाओं को समन्वित किया जाता है ”।
टी॰ क्लेविन लिबरल आर्ट इन्स्टीट्यूशन द्वारा प्रकाशित जर्नल के अनुसार, अंतर अनुशासनिक अध्ययन पाठ्यक्रम को तैयार करने और प्रशिक्षण की एक ऐसी विधि है जिसके तहत फैकल्टी व्यक्तिगत या दल के रूप में विद्यार्थियों की क्षमता को विकसित करने, मुद्दों की समझ व्यापक करने, समस्याओं के समाधान हेतु नए उपागमों के निर्माण तथा समस्या समाधान की दिशा में जो एक अनुशासन या प्रशिक्षण क्षेत्र से बाहर हो, के लिए दो या अधिक अनुशासनों की सूचनाओं,आंकड़ों, तकनीकों, उपकरणों, सिद्धांतों की पहचान व मूल्यांकन करती है। 
उपरोक्त परिभाषाओं को समन्वित करके अंतर अनुशासनिक अध्ययन की एक समग्र परिभाषा बन सकती है, “अंतर अनुशासनिक अध्ययन वैसे प्रश्नों के उत्तर देने की प्रक्रिया, जटिल विषयों को समझने की पद्धति, समस्या समाधान की पद्धति है जिसका समाधान एक से अधिक अनुशासन की समझ से संभव होता है तथा एक से अधिक अनुशासनों पर निर्भर रहकर भी उनके अंतर्दृष्टियों का समन्वय इस लक्ष्य को ध्यान में रखकर किया जाए कि वृहत समझ की प्ररचना हो सके ”।
सामान्य ढंग से अनुशासन और अंतर अनुशासन अध्ययन में विभेद करने पर हम पाते हैं कि एक अनुशासन में किसी निश्चित विषय के ज्ञान का भाग प्राप्त होता है जबकि अंतर अनुशासनिक अध्ययन में विभिन्न विषयों के समन्वय से ज्ञान की निर्मिति होती है।
किसी खास अनुशसन के अध्ययन में ज्ञान प्राप्त करने की निश्चित विधि होती है जो उस अनुशासन के क्षेत्र में ही ज्ञान अवधारणाएँ और सिद्धान्त सृजन की ओर अग्रसर होती है जबकि अंतर अनुशासनिक अध्ययन में ज्ञान प्राप्त करने की कई अनुशासनिक विधियाँ होती है जिससे नए बोधात्मक, संज्ञानात्मक प्रगति और विस्तृत समझ का विकास होता है।
किसी एक अनुशासन में मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रम द्वारा उस अनुशासन के विद्वानो का समुदाय ज्ञान के क्षेत्र को नियंत्रित करने की इच्छा रखते हैं जबकि अंतर अनुशासनिक अध्ययन में ज्ञान के नए आयामों के विकास के चलते पाठ्यक्रम में परिवर्तन की संभावना बनी रहती है और खास विद्वत समुदाय का वर्चस्व भी नही होता है।
किसी एक अनुशासन के अध्ययन की अपेक्षा अंतर अनुशासनिक अध्ययन द्वारा ज्ञान के क्षेत्र में रूढ़ियों और पूर्वाग्रहों के निवारण की संभावना बहुत अधिक होती है।      
अंतर अनुशासनिक अध्ययन आधुनिक युग की आवश्यकता है इसका कारण यह है कि ज्ञान अखंड भले ही हो, लेकिन उसकी प्राप्ति और प्रतीति के मार्ग अलग-अलग होते हैं। ये मार्ग ही विभिन्न विद्याओं के रूप में जाने जाते हैं। प्राचीन काल में ज्ञान को ब्रह्म के समान समग्र एवं अखंड माना जाता था और उसका स्वरूप संश्लिष्ट था। वेद इसका प्रमाण हैं। ज्ञान का विभाजन दर्शन, विज्ञान आदि संकायों में नहीं किया जाता था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राजनीतिक और सामाजिक पहलुओं का ज्ञान एक साथ ही मिलता है। गैलीलियो से पहले दर्शन और विज्ञान को एक ही समझा जाता था। तब दर्शन को मीमांसा दर्शन और विज्ञान को व्यावहारिक दर्शनों के नाम से जाना जाता था। प्लेटो के रिपब्लिक में भी ज्ञान अखंड रूप में ही विद्यमान है। इसके पश्चात विभाजन का युग आया और ज्ञान का रूप विश्लिष्ट यानि अलग-अलग होने लगा। बाद के दिनों में ज्ञान की अनेकों शाखाएँ विकसित हो गई। लेकिन ज्ञान की ये शाखाएँ स्वतंत्र होते हुए भी दूसरे से पूर्णतः निरपेक्ष नही हैं क्योकि विद्या की प्रत्येक शाखा जीवन को समझने का ही मार्ग प्रदान करती हैं इसलिए उनका प्रभाव एक दूसरे पर पड़ता ही है। उत्तर आधुनिक युग में विद्वानों ने महसूस किया की ज्ञान का शुद्ध स्वरूप तभी स्थिर हो सकता है जब उसकी एक से अधिक शाखाओं के बीच के अंतर सम्बन्धों का अध्ययन किया जाये। इसलिए वर्तमान समय में अंतर आधुनिक अध्ययन का जो स्वरूप विकसित हुआ है वह तीन-चार दशक ही पुराना है लेकिन इसकी लोकप्रियता और उपयोगिता इसके नए-नए आयाम विकसित कराते जा रहे हैं। शुद्ध विज्ञान का आधार पूर्णतः बौद्धिक होता है इसलिए उसमें कम लेकिन मानविकी विषयों में अंतर अनुशासनिक अध्ययन की अधिक आवश्यकता होती है। अनुपर्युक्त विज्ञान की शाखाओं में भी अंतर अनुशासनिक अध्ययन की अधिक उपयोगिता होती है।
अंतर आधुनिक अध्ययन के लाभ की स्पष्टता के लिए हम विज्ञान के क्षेत्र से एक उदाहरण चुनते हैं – रेडियो कार्बन का आविष्कार और पुरातत्व अध्ययन ज्ञान की बिलकुल अलग-अलग शाखाओं से संबन्धित हैं लेकिन अंतर अनुशासनिक अध्ययन के आधार पर ही केमिस्ट विलार्ड लिब्बी ने रेडियो कार्बन डेटिंग पद्धति की खोज की जिसकी सहायता से आज किसी भी पुरातत्व अवशेष की उम्र का अनुमान लगाया जा सकता है। इस कार्य के लिए  विलार्ड लिब्बी को 1960 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
अंतर आधुनिक अध्ययन के संदर्भ में विद्वान यंग ब्लड का कहना है कि “अंतर अनुशासनिक तकनीक की नींव भविष्य में खोज और शोध का नेतृत्व करेंगे। वर्तमान समय में अंतर अनुशासनिक अध्ययन की उपलब्धियों को देखकर यह बात सत्य ही प्रतीत होती है। प्रदर्शनकारी कलाओं के संदर्भ में विचार करें तो यह स्पष्ट होता है कि अंतर अनुशासनिक अध्ययन रचना की परिपूर्णता और ओजस्वी होने की संभावना को कई गुना बढ़ा देता है। ऐसा नहीं है कि इस अध्ययन पद्धति की खामियां नहीं है। सबसे बड़ी खामी है, अंतर अनुशासनिक अध्ययन को बढ़ावा मिलने से किसी भी अनुशासन की मूल सिद्धांतों का विकास बाधित होता है। लेकिन हानि की अपेक्षा लाभ अधिक होने से यह कहना कतई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ज्ञानार्जन के क्षेत्र में भविष्य अंतर अनुशासनिक अध्ययन का ही है।

 संदर्भ :
1. वर्मा, (डॉ॰) हरिश्चंद्र, 2006 ई॰, शोध प्रविधि, हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला – 134113
2.     सिंघल, बैजनाथ, 2008 ई॰, शोध, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली – 110002
3.     गाणेशन, एस॰एन॰, 2009 ई॰, अनुसंधान प्रविधि सिद्धान्त और प्रक्रिया, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद - 1

Questions Paper@ IGNOU BPSC-133 : तुलनात्मक सरकार और राजनीति

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