Tuesday, 22 August 2017

भगत सिंह का अंतिम पत्र





22 मार्च,1931

साथियो,


स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता. लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता.
मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है - इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता.
आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं. अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी.
हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता.
इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.
आपका साथी,
भगत सिंह


Sunday, 20 August 2017

सरदार पटेल और आर.एस.एस.



              ये लोग योजनाबद्ध तरीके से सरदार पटेल को हिन्दुत्ववादी साबित करने की नीच हरकतें कर रहे हैं  । नाथूराम गोडसे का आर.एस.एस. से सम्बन्ध नहीं रहा है, ऐसा घोषित करने की भीख आर.एस.एस. के नेताओं ने नाथूराम से ही मा!गी थी  । हकीकत यह है कि गांधी-हत्या के पाच वर्ष पहले तक नाथूराम आर.एस.एस. का प्रचारक था  । आर.एस.एस. पर से प्रतिबन्ध उठाया जा सके, इसके लिए सरदार पटेल ने नाथूराम को ऐसा घोषित करने के लिए कहा था, यह दावा गोपाल गोडसे करते हैं  । इस प्रकार सरदार पटेल हिन्दुत्ववादी थे, और आर.एस.एस. से मिले हुए थे, ऐसा गन्दा संकेत ये दो लोग बेशर्मी से करते हैं  । आरम्भ में गुरु गोलवलकर की लिखी 'अवर नेशनहुड डिफाइन्डल् पुस्तक का उल्लेख किया गया है  । इस पुस्तक का प्रकाशन 1939 में हुआ था  । इस पुस्तक के कारण जब आर.एस.एस. के लिए कठिनाइया! बढने लगी, तब तुरन्त उससे छुटकारा पाने के लिए गुरु गोलवलकर ने इस पुस्तक के लेखक का नाम बदलकर बाबाराव सावरकर कर दिया  । दूसरे के नाम की पुस्तक अपने नाम पर प्रकाशित कराने की बात हमने सुनी है  । परन्तु इस आदमी ने तो अपनी चमडी बचाने के लिए अपनी ही पुस्तक दूसरे के नाम कर दी  । ऐसे कायर और कपटी आदमी को क्या प्रामाणिक, बहादुर और देशभक्त कहा जा सकता है ?

            गोपाल गोडसे ने जेल से छूटने के लिए भारत सरकार को एकगदो बार नहीं, 22 बार अर्जी दी थी और ऐसे लोग अपने को शूरवीर कहते हैं  । 1नेलसन मण्डेला तो 32 वर्ष जेल में रहे थे, और एक बार भी उन्होंने जेल से छूटने के लिए अर्जी नहीं दी थी  ।1 भारत सरकार ने गोपाल गोडसे को सजा की मुद्दत पूरी होने से पहले रिहा नहीं किया, इसलिए गोपाल गोडसे कहते हैं कि सरकार ने उनके साथ अन्याय किया  । यह धूर्त आदमी, उसके तुरन्त बाद कहता हैं कि सरदार पटेल होते, तो हमारे   ।पर यह अन्याय नहीं हुआ होता  । एक निःशस्त्र इन्सान की प्रार्थना के वक्त हत्या करने वाले, सरासर झूठ बोलने वाले, निर्दोष व्यक्ति को अपने साथ कीचड में सानने की कोशिश करने वाले लोगों को क्या कभी भी प्रामाणिक, बहादुर और देशभक्त माना जा सकता है ?

  भारतीय राजनीति में हिन्दुत्ववादी तो मूर्ख-शिरोमणि थे  । गांधीजी की हत्या करके उन्होंने अपने ही पा!व पर कुल्हाडी मारी थी  । गांधीजी की हत्या के साथ ही साम्प्रदायिक दंगे बन्द नहीं हुए होते, और उस स्थिति में हिन्दुत्ववादियों को शक्ति बढाने का मौका मिला होता  । देश का साम्प्रदायिक विभाजन और साम्प्रदायिक ताकतों का ध्रुवीकरण हुआ होता तो शायद भारत में सेक्यूलर संविधान और सेक्यूलर राज्य अस्तित्व में नहीं आया होता  । गांधीजी ने तो अपने प्राणों की आहुति देकर भी देश की सेवा की,जबकि मूर्ख हिन्दुत्ववादियों ने महात्मा के प्राण लेकर अपने ही ध्येय को नुकसान पहुचाया  ।


यह है गांधीगहत्या की वस्तुस्थिति । जैसे कि प्रारम्भ में ही कहा है कि नाथूराम गोडसे धर्म-जनूनी था, पागल नहीं  । ठण्डे कलेजे से, षड्यंत्र रचकर उसने गांधीजी की हत्या की थी  । दूसरी बात कि, गांधीजी की हत्या 55 करोड रुपये और मुसलमानों के प्रति उनके पक्षपाती रवैये के कारण नहीं, हताशा और ईर्ष्या के कारण की गयी थी  । गांधीजी जब तक जीवित हैं तब तक अपना कुछ चलने वाला नहीं है, यह हकीकत उन्हें परेशान करती थी  । इसी कारण कुछ लोग उन्हें गालिया! देते थे, कुछ लोग मौका देखकर तोडफोड करते थे, तो कुछ लोग उनकी हत्या करने का प्रयास करते थे  । तीसरी बात कि, ये लोग प्रामाणिक, बहादुर और देशभक्त नहीं थे  । काले-कारनामे करने वालों, झूठ फैलाने वालों, गन्दी शरारतें करने वालों तथा प्रार्थना करते हुए निःशस्त्र व्यक्ति की हत्या करने वालों को प्रामाणिक, बहादुर, देशप्रेमी तो हरगिज नहीं कहा जा सकता  । झूठगफरेब और षड्यंत्र साम्प्रदायिकता की राजनीति के अनिवार्य अंग हैं  । साजिश करके ही इन्होंने सन् 1948 में अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद में रामलीला की तसवीर रखवायी थी, षड्यंत्र करके ही मस्जिद तोडी गयी और अब मन्दिर बनाने की भी साजिश कर रहे हैं  । देशप्रेम की चादर ओढे, हमारे आसपास घूमनेवाले, इन विकृत-कुण्ठित-मानस के षड्यंत्रकारियों को हमें अच्छी तरह पहचान लेना चाहिए  । 

पंकज "वेला ",20/08/2017

गांधी-हत्या के प्रयास 1934 से ही !.....





गांधीजी भारत आये उसके बाद उनकी हत्या का पहला प्रयास 25 जून, 1934 को किया गया  । पूना में गांधीजी एक सभा को सम्बोधित करने के लिए जा रहे थे, तब उनकी मोटर पर बम फेंका गया था  । गांधीजी पीछे वाली मोटर में थे, इसलिए बच गये  । हत्या का यह प्रयास हिन्दुत्ववादियों के एक गुट ने किया था  । बम फेंकने वाले के जूते में गांधीजी तथा नेहरू के चित्र पाये गये थे, ऐसा पुलिसगरिपोर्ट में दर्ज है  । 1934 में तो पाकिस्तान नाम की कोई चीज क्षितिज पर थी नहीं, 55 करोड रुपयों का सवाल ही कहा! से पैदा होता ?


गांधीजी की हत्या का दूसरा प्रयास 1944 में पंचगनी में किया गया  । जुलाई 1944 में गांधीजी बीमारी के बाद आराम करने के लिए पंचगनी गये थे  । तब पूना से 20 युवकों का एक गुट बस लेकर पंचगनी पहुंचा  । दिनभर वे गांधी-विरोधी नारे लगाते रहे  । इस गुट के नेता नाथूराम गोडसे को गांधीजी ने बात करने के लिए बुलाया  । मगर नाथूराम ने गांधीजी से मिलने के लिए इन्कार कर दिया  । शाम को प्रार्थना सभा में नाथूराम हाथ में छुरा लेकर गांधीजी की तरफ लपका  । पूना के सूरती-लॉज के मालिक मणिशंकर पुरोहित और भीलारे गुरुजी नाम के युवक ने नाथूराम को पकड लिया  । पुलिस-रिकार्ड में नाथूराम का नाम नहीं है, परन्तु मशिशंकर पुरोहित तथा भीलारे गुरुजी ने गांधी-हत्या की जा!च करने वाले कपूर-कमीशन के समक्ष स्पष्ट शब्दों में नाथूराम का नाम इस घटना पर अपना बयान देते समय लिया था  । भीलारे गुरुजी अभी जिन्दा हैं  । 1944 में तो पाकिस्तान बन जाएगा, इसका खुद मुहम्मद अली जिन्ना को भी भरोसा नहीं था  । ऐतिहासिक तथ्य तो यह है कि 1946 तक मुहम्मद अली जिन्ना प्रस्तावित पाकिस्तान का उपयोग सना में अधिक भागीदारी हासिल करने के लिए ही करते रहे थे  । जब पाकिस्तान का नामोनिशान भी नहीं था, तब क्यों नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या का प्रयास किया था ?


गांधीजी की हत्या का तीसरा प्रयास भी इसी वर्ष सितम्बर में, वर्धा में, किया गया था  । गांधीजी मुहम्मद अली जिन्ना से बातचीत करने के लिए बम्बई जाने वाले थे  । गांधीजी बम्बई न जा सके, इसके लिए पूना से एक गुट वर्धा पहु!चा  । उसका नेतृत्व नाथूराम कर रहा था  । उस गुट के ग.ल. थने के नाम के व्यक्ति के पास से छुरा बरामद हुआ था  । यह बात पुलिस-रिपोर्ट में दर्ज है  । यह छुरा गांधीजी की मोटर के टायर को पंक्चर करने के लिए लाया गया था, ऐसा बयान थने ने अपने बचाव में दिया था  । इस घटना के सम्बन्ध में प्यारेलाल (म.गांधी के सचिव) ने लिखा है : 'आज सुबह मुझे टेलीफोन पर जिला पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट से सूचना मिली कि स्वयंसेवक गम्भीर शरारत करना चाहते हैं, इसलिए पुलिस को मजबूर होकर आवश्यक कार्रवाई करनी पडेगी  । बापू ने कहा कि मैं उसके बीच अकेला जा  ।!गा और वर्धा 1रेलवे स्टेशन1 तक पैदल चलू!गा, स्वयंसेवक स्वयं अपना विचार बदल लें और मुझे मोटर में आने को कहें तो दूसरी बात है  । कृबापू के रवाना होने से ठीक पहले पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट आये और बोले कि धरना देने वालों को हर तरह से समझाने-बुझाने का जब कोई हल न निकला, तो पूरी चेतावनी देने के बाद मैंने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है  ।


धरना देनेवालों का नेता बहुत ही उनेजित स्वभाववाला, अविवेकी और अस्थिर मन का आदमी मालूम होता था, इससे कुछ चिंता होती थी  । गिरफ्तारी के बाद तलाशी में उसके पास एक बडा छुरा निकला  । (महात्मा गांधी : पूर्णाहुति : प्रथम खण्ड, पृष्ठ 114)


इस प्रकार प्रदर्शनकारी स्वयंसेवकों की यह योजना विफल हुई  । 1944 के सितम्बर में भी पाकिस्तान की बात उतनी दूर थी, जितनी जुलाई में थी  ।


गांधीजी की हत्या का चौथा प्रयास 29 जून, 1946 को किया गया था  । गांधीजी विशेष टेंन से बम्बई से पूना जा रहे थे, उस समय नेरल और कर्जत स्टेशनों के बीच में रेल पटरी पर बडा पत्थर रखा गया था  । उस रात को डांइवर की सूझ-बूझ के कारण गांधीजी बच गये  । दूसरे दिन, 30 जून की प्रार्थना-सभा में गांधीजी ने पिछले दिन की घटना का उल्लेख करते हुए कहा : ''परमेश्वर की कृपा से मैं सात बार अक्षरशः मृत्यु के मु!ह से सकुशल वापस आया हू!  । मैंने कभी किसी को दुख नहीं पहुचाया  । मेरी किसी के साथ दुश्मनी नहीं है, फिर भी मेरे प्राण लेने का प्रयास इतनी बार क्यों किया गया, यह बात मेरी समझ में नहीं आती  । मेरी जान लेने का कल का प्रयास निष्फल गया  ।'


नाथूराम गोडसे उस समय पूना से 'अग्रणील् नाम की मराठी पत्रिका निकालता था  । गांधीजी की 125 वर्ष जीने की इच्छा जाहिर होने के बाद 'अग्रणी' के एक अंक में नाथूराम ने लिखा- 'पर जीने कौन देगा ?' यानी कि 125 वर्ष आपको जीने ही कौन देगा ? गांधीजी की हत्या से डेढ वर्ष पहले नाथूराम का लिखा यह वाक्य है  । यह कथन साबित करता है कि वे गांधीजी की हत्या के लिए बहुत पहले से प्रयासरत थे  । 'अग्रणी' का यह अंक शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध है  । 1946 के जून में पाकिस्तान बन जाने की शक्यता तो दिखायी देने लगी थी, परन्तु 55 करोड रुपयों का तो उस समय कोई प्रश्न ही नहीं था  ।इसके बाद 20 जनवरी,1948 को मदनलाल पाहवा ने गांधीजी पर, प्रार्थनागसभा में, बम फेंका और 30 जनवरी, 1948 के दिन नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी  ।


55 करोड रुपयों के बारे में एक और हकीकत भी समझ लेना जरूरी है  । देशगविभाजन के बाद भारत सरकार की कुल सम्पनि और नकद रकमों का, जनसंख्या के आधार पर, बटवारा किया गया था  । उसके अनुसार पाकिस्तान को कुल 75 करोड रुपये देना तय था  । उसमें से 20 करोड रुपये दे दिये गये थे  । और, 55 करोड रुपये देना अभी बाकी था  । कश्मीर पर हमला करने वाले पाकिस्तान को यदि 55 करोड रुपये दिये गये, तो उसे वह सेना के लिए खर्च करेगा, यह कहकर 55 करोड रुपये भारत सरकार ने रोक लिए थे  । लार्ड माउण्ट बेटन का कहना था कि यह रकम पाकिस्तान की है, अतः उन्हें दे दी जानी चाहिए  । इस बात की जानकारी गांधीजी को हुई तो उन्होंने 55 करोड रुपये पाकिस्तान को दे देने की माउण्ट बेटन की बात का समर्थन किया  । 12 जनवरी को गांधीजी ने प्रार्थना-सभा में अपने उपवास की घोषणा की थी, और उसी दिन 55 करोड रुपये की बात भी उठी थी  । लेकिन गांधीजी का उपवास 55 करोड रुपये के लिए नहीं, दिल्ली में शान्ति-स्थापना के लिए था  ।


जनवरी माह के प्रथम सप्ताह में एक मौलाना ने आकर गांधीजी से कहा था कि पाकिस्तान का विरोध करने वाले हमारे जैसे राष्टंवादी मुसलमान पाकिस्तान जा नहीं सकते, और हिन्दू सम्प्रदायवादी हमें यहा! जीने नहीं देते  । हमारे लिए तो यहा! नरक से भी बदतर स्थिति है  । आप कलकना में उपवास कर सकते हैं, पर दिल्ली में नहीं करते ? ऐसी शिकायत भी उस मौलाना ने गांधीजी से की थी  । गांधीजी मौलाना की बात सुनकर दुखी हो गये थे  । दिल्ली में शान्ति-स्थापना के लिए अनेक प्रयास होने के बावजूद शान्ति स्थापित नहीं हुई  । अन्त में 13 जनवरी से गांधीजी ने उपवास आरम्भ कर दिया  । यह उपवास साम्प्रदायिक शान्ति के लिए था, न कि 55 करोड रुपयों के लिए  । 55 करोड रुपयों का सवाल तो संयोगवश उसी समय प्रस्तुत हो गया था  । गांधीजी ने अपनी प्रार्थना-सभा में उपवास का हेतु स्पष्ट रूप से घोषित किया था और उसके बाद उनका उपवास समाप्त कराने के लिए हिन्दुत्ववादियों सहित तमाम सम्बन्धित पक्षों ने शान्ति की अपील पर हस्ताक्षर किये थे  । इसके बावजूद भी हिन्दुत्ववादी झूठे प्रचार करते जा रहे हैं  ।



गांधीजी की हत्या करने वाले यह दावा करते हैं कि 55 करोड रुपये की घटना से उनेजित होकर गांधीजी की हत्या का षड्यंत्र रचा गया था  । इसका अर्थ तो यह होता है कि यह षड्यंत्र 13 जनवरी के बाद रचा गया था  । तो क्या मात्र सात दिनों में, गांधीजी पर बम फेंकने की घटना उस जमाने में सम्भव हो सकती थी ? मात्र 17 दिनों में ही हत्या करनेवाले इकट्ठे हो गये, षड्यंत्र रच लिया, ग्वालियर से पिस्तौल हासिल करके दिल्ली आये और गांधीजी की हत्या कर दी  । इतने कम समय में षड्यंत्र रच लिया गया उस पर अमल भी हो गया, यह बात गले से नीचे उतरने लायक नहीं  । 13 जनवरी को नाथूराम ने अपनी बीमे की पालिसी नाना आप्टे की पत्नी के नाम करा दी थी  । अदालत ने भी अपने फैसले में 1 जनवरी, 1948 को षड्यंत्र-रचने का दिन माना है  । कुछ क्षणों के लिए उनकी बात मान भी लें तो 55 करोड रुपयों का सवाल सामने आया उसके पहले से ही, गांधीजी की हत्या करने के प्रयास क्यों किये जाते रहे, यह प्रश्न अनुनरित ही रह जाता है  । एक घटना को छोडकर, बाकी सभी प्रयास महाराष्टं में, और पूना के ही हिन्दुत्ववादियों द्वारा क्यों किये गये ? तीन प्रयास तो खुद नाथूराम गोडसे ने किये  । इस तरह जाहिर है कि 55 करोड रुपये की बात तो बिलकुल झूठ है  ।


पंकज ‘वेला’
9:45 PM.

20/08/2017 

पाकिस्तान का निर्माण किसने किया ?...





1937 में हिन्दू महासभा के अहमदाबाद-अधिवेशन में खुद सावरकर ने द्विराष्टंवाद के सिद्धान्त का समर्थन किया था । मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के लिए प्रस्ताव किया, उससे तीन वर्ष पूर्व ही सावरकर ने हिन्दू और मुसलमान, ये दो अलग-अलग राष्टींयताए! हैं, यह प्रतिपादित किया था । जब दो साम्प्रदायिक ताकतें एक-दूसरे के खिलाफ काम करने लगती हैं, तब दोनों एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होती हैं, और वह होता है आत्मविनाश का । हिन्दू सम्प्रदायवादियों ने ऐसा करके अंग्रेजों और भारत-विभाजन चाहने वाले मुसलमानों को फायदा ही पहु!चाया था । इन महान देशप्रेमियों ने 1942 की आजादी के आन्दोलन में तो भाग नहीं ही लिया था, उल्टे ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर यह जानकारी भी दी थी कि हम आन्दोलन का समर्थन नहीं करते हैं । गांधीजी आये, उसके पहले राष्टींय राजनीति का नेतृत्व उनके पास ही था । लेकिन तब भी उन्होंने उन दिनों कोई बडा पराव्म नहीं किया था, यह हम सबकी जानकारी में है ही । गांधी के आने के बाद भी इन लोगों ने राष्टंहित में कोई मामूली काम करने की भी जहमत नहीं उठाई । गुरु गोलवलकर ने ऐडाल्फ हिटलर का अभिनन्दन किया, फिर भी अंग्रेजों ने उनको गिरफ्तार नहीं किया । कारण यह कि अंग्रेज मानते थे कि ये दो कौडी के निकम्मे लोग हैं । ये लोग तो तला पापड भी नहीं तोड सकते ! अंग्रेजों का यह आकलन था उनकी ताकत के बारे में ।
भारत-विभाजन के लिए जितने जिम्मेदार मुस्लिम लीग तथा अंग्रेज हैं, उतने ही ये मूर्ख हिन्दुत्ववादी भी जिम्मेदार हैं । आजाद भारत में हिन्दू ही हुकूमत करेंगे, ऐसा शोर मचाकर हिन्दुत्ववादियों ने विभाजनवादी मुसलमानों के लिए एक ठोस आधार दे दिया था । ये विभाजनवादी लोग कहम् मुहम्मद अली जिन्ना, कहम् सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर और श्यामाप्रसाद मुखर्जी आदि का भय दिखाकर उनका चालाकीपूर्वक उपयोग करते थे । हिन्दुत्ववादी अभी भी अपनी बेवकूफियों पर गर्व का अनुभव करते हैं । अंग्रेजों को जिन्हें कभी जेल में रखने की जरूरत ही नहीं पडी, उन गोलवलकर की अदृश्य ताकत का उपयोग अंग्रेज गांधीजी के खिलाफ करते थे । शहाबुद्दीन राठौड की भाषा में कहें तो उस समय की राष्टींय राजनीति में यो लोग जयचन्द थे । भारत का विभाजन गांधी के कारण नहीं हुआ है, इन लोगों के कारण हुआ है । गांधीजी ने तो अन्त तक भारत विभाजन का विरोध किया था । गांधीजी ने अन्तिम समय तक इसके लिए जिन्ना के साथ क्रमबद्ध मंत्रणाए! कीं । गांधीजी ने पाकिस्तान को स्टेट माना था । (देखें प्यारेलाल लिखित 'लास्ट फेज') गांधीजी सर्वसमावेशक उदार राष्टंवादी थे । इसीलिए उन्होंने सब कौमों को अपनाया था, मात्र मुसलमानों को ही नहीं । प्रत्येक छोटी अस्मिता व्यापक राष्टींयता में मिल जाय, यह चाहते थे गांधीजी । एक राष्टींय नेता की यह दूरदृष्टि थी । महात्मा का यह वात्सल्य-भाव था सबके प्रति । बदनसीबी से हिन्दू राष्टंवादी यह समझना ही नहीं चाहते थे  ।

पंकज ‘वेला’
9:45 PM.
                                                  20/08/2017

विभाजन रोकने के लिए इन लोगों ने क्या किया ?





अब अन्तिम बात । गांधीजी को भारत-विभाजन रोकना चाहिए था, यह मा!ग ये लोग किस मु!ह से करते हैं ? गांधीजी को विभाजन रोकने के लिए उपवास करना चाहिए था, ऐसी अपेक्षा करने का इनको क्या नैतिक-अधिकार है ? जिसको आप देश के लिए कलंक समझते हैं, जिसका वध करना जरूरी मानते हैं, उसी से आप ऐसी अपेक्षाए! भी रखते हैं? आपने क्यों नहीं विभाजन को रोकने के लिए कुछ किया ? सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर ने विभाजन के विरुद्ध क्यों नहीं आमरण उपवास किया ? क्यों नहीं इसके लिए उन्होंने हिन्दुओं का व्यापक आन्दोलन चलाया ? जिसको गालिया! देते हों, उसी से देश बचाने की गुहार भी लगाते हो ? और जब गांधीजी अकेले पड जाने के कारण देश का विभाजन रोक नहीं पाये, तब आप उनको राक्षस मानकर उनका वध करने की साजिश रचते हो ? इसको मर्दानगी कहेंगे या नपुंसकता ?
मैंने गोपाल गोडसे तथा अन्य दूसरे अनेक हिन्दुत्ववादी विद्वानों के समक्ष ऐसे सवाल उठाये हैं, लेकिन किसी के पास इसका कोई उनर नहीं है । इन सबके बावजूद भी ये अपनी डम्ग हा!कने से बाज नहीं आते हैं । सत्य को जानते हुए भी जो असत्य का प्रचार करे, उसको धूर्त ही कहेंगे । हिन्दुत्ववादी पहले दर्जे के धूर्त हैं ।
ये हिन्दुत्ववादी लगातार जो तीन झूठ बोल रहे हैं, उसमें से इस पहली झूठ की हकीकतों को हमने देखा ।
भारत-विभाजन के लिए गांधीजी जिम्मेदार नहीं थे । भारत-विभाजन के लिए कई ऐतिहासिक तथा सामयिक तन्व एवं ताकतें जिम्मेदार थी । ब!टवारा चाहने वाले मुसलमान जिम्मेदार थे, अंग्रेज जिम्मेदार थे तथा उनके कारनामों के लिए अनुकूल राह बनाने-दिखाने वाले मूर्ख हिन्दुत्ववादी जिम्मेदार थे ।

पंकज ‘वेला’
9:45 PM.

20/08/2017 

गांधी जी की विचारधारा के स्रोत


गांधी जी की विचारधारा के स्रोत




गांधी जी के विचारों पर अनेक भारतीय धार्मिक पुस्तकों, धर्मों तथा पश्चिमी दार्शनिकों के विचारों का प्रभाव पड़ा था. इंग्लैंड में अध्ययन करते समय गांधी जी ने सर एडविन अर्नाल्ड द्वारा अनुदित  गीता पढ़ी. इसने उनके दृष्टिकोण को सर्वाधिक प्रभवित किया तथा उन्हें कर्म योगी बनाया. वे गीता को अपना पथ प्रदर्शक तथा आध्यात्मिक निर्देश ग्रंथ मानते थे. गांधी जी ने सत्य व अहिंसा के नैतिक सिद्धांतों तथा आदर्शों के बारे में गीता से बहुत कुछ सीखा था. गीता के अतिरिक्त गांधीजी ने उपनिषद्, पतंजलि के योग सूत्र, रामायण, महाभारत, जैन तथा बौद्ध धर्म की पुस्तकों का भी अध्ययन किया था. इन पुस्तकों के अध्ययन से सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह में उनकी आस्था बहुत दृढ़ ही गई. ईसाई धार्मिक ग्रंथों में न्यू टेस्टामेंट तथा समर्रो ऑन द माउंट का गांधी जी के विचारों पर गहरा प्रभाव पड़ा. अहिंसक प्रतिरोध की शिक्षा उन्हें ईसा मसीह के इन शब्दों से मिली. भगवन उन्हें क्षमा कीजिये. क्योंकि वे नहीं जानते की वे क्या कर रहे हैं.


आधुनिक दार्शनिकों का प्रभाव.....तीन आधुनिक दार्शनिकों जॉन रस्किन, हेनरी डेविड थोरो तथा टॉलस्टॉय ने गांधीजी को अत्यंत प्रभावित किया. जॉन रस्किन की पुस्तक अनटू दिस लास्ट से शारीरिक श्रम का आदर करना सीखा तथा उस आर्थिक व्यवस्था को सर्वोत्तम माना जिससे सबको लाभ होता है. थोरो से गांधी जी ने सविनय अवज्ञा की प्रेरणा ली. टॉलस्टॉय के प्रभाव में गांधी जी ने ईसाई मत के नैतिक अराजकतावाद  के सिद्धांत को अपनाया. उनके ईश्वर का साम्राज्य अपने अंदर हैनामक निबंध को पढ़ने के बाद गांधी जी के मन का संशय तथा नास्तिकता दूर हो गयी और अहिंसा के प्रति उनका विश्वास दृढ़ हो गया. टॉलस्टॉय ने प्रेम को सभी समस्याओं का समाधान माना था. उन्होंने कहा था की ईसा अपने पड़ोसी के साथ झगड़ा नहीं करता. न वह आक्रमण करता है और न ही हिंसा का प्रयोग करता है. दार्शनिकों के अतिरिक्त गुजराती कवि रायचंद भाई के विचारों ने भी गांधी जी के जीवन व विचारधारा को प्रभावित किया.


लोकचेतना जागृत करने वाले साधन...जनचेतना जागृत करने में गांधी जी दक्षिण अफ्रीका तथा भारत में तो सफल रहे ही साथ ही उनके चमत्कारी आकर्षक व्यक्तित्व से पूरा विश्व प्रभावित हुआ. गांधी जी में ऐसे तमाम गुण थे जिसके कारण जनता उनकी ओर खिचीं चली आती थी. यहाँ गांधी जी के वैचारिक हथियार प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिसके कारण लोक चेतना जागृत हुई -

1.     गांधी जी के सम्पूर्ण जीवन का आधार सत्यपर आधारित था, सत्य के सामने वे किसी बात से समझौता करने को तैयार नहीं होते थे चाहे इसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े. उनका कहना था कि हमारा प्रत्येक कार्य एवं व्यवहार सत्य के लिए होना चाहिए. सत्य के अभाव में हम किसी भी नियम का शुद्धता से पालन नहीं कर सकते.सत्य-


2.     सत्य के शुद्ध अर्थ में गांधी जी सत्य और ईश्वर को एक ही मानते थे. वे ईश्वर की पूजा सत्य के रूप में करते थे. इस अर्थ में सत्य मानव-जीवन का लक्ष्य बन जाता है. गांधी जी के अनुसार सत्य का पालन प्रत्येक क्षेत्र में होना चाहिए चाहे वह अर्थनीति, धर्म, राजनीति, परिवार, समाज या देश हो. गांधी जी बचपन से ही सत्य का पालन करते थे और सत्य बोलते थे। गांधी जी की वास्तव में यह सबसे बड़ी देन थी कि उन्होंने व्यक्तिगत आधार पर सत्य की खोज के लिए किए जाने वाले प्रयासों का सम्बन्ध  सामाजिक हित से जोड़ दिया. आध्यात्मिक पूर्णता के इच्छुक लोगों के लिए गांधी जी ने यह नया मार्ग निकाला. गांधी जी ने कहा कि ईश्वर को यदि प्राप्त करना है तो गरीबों, दुखियों एवं असहायों की सहायता करो, नंगे को वस्त्र दान दो, भूखे को अन्न दान दो, बेघर को आश्रय दो आदि. गांधी जी का मानना था की जो तथ्य सत्य की कसौटी पर खरा न उतरे उसे त्याग देना चाहिए. सत्य के अतिरिक्त कुछ भी स्थायी नहीं है, सत्य में तो सच्चे ज्ञान का भाव केन्द्रित होता है. गोपीनाथ धवन ने गांधी जी के सत्य के बारे में लिखा है सत्य का सिद्धांत केवल भाषण के सत्य तक सीमित नहीं है, इसमें क्रिया का भी सत्य निहित है


अहिंसा( Non Violence)....गांधीजी के आध्यात्मिक आदर्शवाद में सत्य के बाद अहिंसा का विशिष्ट स्थान है. अहिंसा की परम्परा भारत के लिए कोई नई वस्तु नहीं है प्रायः सभी भारतीय धर्म ग्रन्थों में अहिंसा का स्वरूप प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से देखने को मिलता है. गांधी जी ने अहिंसा का प्रयोग बहुत बड़े पैमाने पर किया, इन्होंने अहिंसा का व्यावहारिक जीवन में प्रयोग कर यह सिद्ध कर दिया कि अहिंसा भी एक महान अस्त्र है. अहिंसा को विश्वव्यापी बनाने का श्रेय गांधी जी को है।

      गांधी जी मानते थे कि मानवीय संबंधों में सभी समस्याओं का एक मात्र हल अहिंसा ही है. अहिंसा, हिंसा से अधिक शक्तिशाली है. अहिंसा का अर्थ है मन, कर्म तथा वचन से किसी भी जीवधारी को आघात या कष्ट न पहुँचाना. गांधी जी का कहना था कि अहिंसा किसी अकर्मण्यता का दर्शन नहीं है. यह तो कर्मठता और गतिशीलता का दर्शन है. गांधी जी के अनुसार जो व्यक्ति मन, कर्म, वचन का पालन करता है उसके लिए कोई शत्रु नहीं होता बल्कि शत्रु भी मित्र बन जाएगा. यंग इंडिया में गांधी जी ने लिखा है अहिंसा बलवान और वीर का गुण है साथ ही यह निर्भयता के बिना असम्भव है. अहिंसा भीरु और कायर लोगों का तरीका नहीं है यह तो उन वीरों का तरीका है जो कि मृत्यु का सामना करने को तैयार है. वह जो हाथ में तलवार लेकर लड़ता है वह नि:संदेह वीर है परन्तु वह जो अपनी छोटी उंगली को उठाये बिना लड़ता तथा बिना डरे मृत्यु का सामना करता है अधिक वीर है.अहिंसा में सर्वोच्च प्रेम की भावना होती है न कि घृणा की. इसी कारण अहिंसा में पराजय की कोई गुन्जाइश नहीं रहती है. घृणा सदैव मरती है किन्तु प्रेम कभी नहीं मरता।


       गांधी जी के अनुसार स्वार्थ द्वेष या फिर क्रोधवश किसी को कष्ट पहुँचाना, किसी का शोषण करना, किसी पर ज़ुल्म करना हिंसा है. यदि कोई व्यक्ति स्वयं हिंसा न करे किन्तु दूसरों को ऐसा करने में मदद करता है, तो उसकी मदद भी हिंसा मानी जाएगी. हिंसा के मूल में सदैव भय होता है, हिंसा चाहे किसी रूप में क्यों न हो सत्य की प्राप्ति में बाधक होता है. हिंसा से व्यक्ति समाज या फिर राष्ट्र का ही ह्रास होता है।

       गांधी जी ने अहिंसा को धर्म से जोड़ते हुए कहा की अहिंसा मेरे धर्म का सिद्धांत भी है”. सामाजिक धर्म के रूप में अहिंसा को विकसित किया जाये, जिससे अधिक से अधिक व्यक्ति या राष्ट्र इसे अपना सके . समाज को अहिंसा के आधार पर संगठित करना हम सब का परम कर्तव्य है. मनुष्य को चाहिए कि वह हिंसा से दूर रहते हुए अहिंसा के सिद्धांत का पालन करें. इससे व्यक्ति निरपेक्ष सत्य या ईश्वर के निकट पहुंचेगा. नीति के रूप में अहिंसा तभी सफल हो सकती है जब लोग इसका साहस के साथ पालन करें. अहिंसा तो सर्वोच्च प्रेम, दया, करुणा और आत्मा का बलिदान है. निःसंदेह सत्य रूपी धर्म की प्राप्ति अहिंसा से ही संभव है।


       अहिंसा का प्रयोग हृदय परिवर्तन करने का साधन है. गांधी जी की अहिंसा पारलौकिक शांति या मोक्षप्राप्ति का ही साधन नहीं है बल्कि सामाजिक शांति, राजनीतिक व्यवस्था, धार्मिक समन्वय और पारिवारिक निर्माण का भी साधन है. आर्थिक क्षेत्र में अहिंसा का तात्पर्य है कि कम से कम प्रत्येक व्यक्ति की न्यूनतम जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हो, जैसे रोटी, कपड़ा, मकान आदि। यदि पूंजीपति वर्ग मजदूरों का शोषण करते है तो यह आर्थिक हिंसा होगी, अतः पूंजीपतियों को चाहिए कि मजदूरों के हृदय को चोट न पहुँचाते हुए उचित मजदूरी प्रदान करें जिससे वे भी दो वक्त की रोटी खा सकें. गांधीजी कहते है कि इससे न केवल पूंजीपतियों एवं मजदूरों के बीच प्रेम भाव का विकास होगा बल्कि मजदूर भी अपना काम सत्य निष्ठता पूर्वक करेंगे।


       गांधी जी ने सच्चे लोकतंत्र की स्थापना में भी अहिंसा के मार्ग को अपनाने के लिए कहा. सच्चे लोकतंत्र या स्वराज्य की प्राप्ति असत्य तथा हिंसात्मक साधनों द्वारा कभी नहीं की जा सकती, क्योंकि इन साधनों का प्रयोग करने का अर्थ होगा अपने विरोधियों को कुचलना. अतः जनता की स्वतंत्रता तो केवल अहिंसक राज्य में ही संभव है. इसलिए गांधी जी कहते थे कि मेरे लिए अहिंसा स्वराज से पहले आती है. गांधी जी ने सत्य और अहिंसा का प्रयोग सभी परिस्थितयों में किया और समस्याओं पर विजय भी प्राप्त की.गांधी जी ने जिस अहिंसा का प्रयोग किया वह निषेधात्मक धारण न होकर विधेयात्मक शक्ति है। अहिंसा बुराई को अच्छाई से जीतने का सिद्धांत है इसमें बदले या दुर्व्यवहार की भावना नहीं होती।        


सत्याग्रह....महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध तथा भारत में विदेशी तथा सामंतवादी शासन के विरुद्ध सफलतापूर्वक सत्याग्रह आन्दोलन का संचालन किया. गांधी जी का सत्याग्रह न केवल दक्षिण अफ्रीका और भारत के लिए नवीन प्रयोग था, अपितु संपूर्ण विश्व के लिए यह अपनी तरह का एक अद्भुत प्रयत्न था, गांधी जी से पहले किसी ने भी सत्य और अहिंसा पर आधारित इतना व्यापक एवं व्यावहारिक प्रयोग नहीं किया था.


       ‘सत्याग्रहशब्द सत्यऔर आग्रहशब्दों से बना है जिसका अर्थ है सत्य के लिए दृढ़ता पूर्वक आग्रह करना। दूसरे शब्दों में भय तथा प्रलोभन के बिना स्वयं कष्ट सहन  करते हुए केवल अहिंसात्मक उपायों की सहायता से सदैव सत्य पर दृढ़ रहना तथा मन वचन तथा कर्म से उसी के अनुसार आचरण करना सत्याग्रह है. गांधी जी ने सत्याग्रह को इसी व्यापक रूप में स्वीकार किया और इसी व्यापक अर्थ में वे दक्षिण अफ्रीका तथा भारत में सत्याग्रह का प्रयोग करते रहे।


       गांधी जी के सत्याग्रहशब्द की उत्पत्ति रंगभेदकी नीति के विरुद्ध हुई. गांधी जी का सत्याग्रह दर्शन सत्य के सर्वोच्च आदर्श पर आधारित था. उनका मानना था सत्याग्रहमनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है. वह पवित्र अधिकार ही नहीं अपितु पुनीत कर्तव्य भी है. यदि सरकार जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती और बेईमानी तथा आतंकवाद का समर्थन करती है तो उसकी अवज्ञा करना आवश्यक हो जाता है किन्तु जो अपने अधिकारों की रक्षा करना चाहते हैं उन्हें हर प्रकार के कष्ट सहने के लिए तैयार रहना चाहिए. सब प्रकार के अन्याय, उत्पीड़न और शोषण के विरुद्ध शुद्धतम आत्मबल का प्रयोग ही सत्याग्रह है. गांधी जी का कहना था कि सरकार के कानूनों का प्रतिरोध करते समय सत्याग्रही को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कहीं उसके द्वारा जाने-अनजाने, सामाजिक अथवा राजनीतिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न न हो जाए. गांधी जी जानते थे कि सत्याग्रह ही एक मात्र अस्त्र है जिसके द्वारा बुराई और अन्याय का प्रतिरोध संभव है ।



पंकज "वेला"
20अगस्त,2017,9:30 PM.

Questions Paper@ IGNOU BPSC-133 : तुलनात्मक सरकार और राजनीति

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